कोलंबो: भारत और श्रीलंका के बीच दशकों पुराना कच्चाथीवू द्वीप विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है. श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिथा हेराथ ने शुक्रवार को बयान जारी कर कहा कि कच्चाथीवू द्वीप पर श्रीलंका का संप्रभु अधिकार स्थापित है, और इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.
हेराथ ने भारत में चल रही बहस को आंतरिक राजनीतिक मुद्दा बताते हुए कहा कि श्रीलंका इस विषय को राजनयिक और कानूनी ढांचे के भीतर हल करना चाहता है. साथ ही उन्होंने भारतीय मछुआरों पर श्रीलंकाई समुद्री क्षेत्र में अनधिकृत प्रवेश और संसाधनों के दोहन का आरोप लगाया.
कच्चाथीवू द्वीप क्यों है विवाद का कारण?
कच्चाथीवू एक छोटा, निर्जन द्वीप है जो पाक जलडमरूमध्य में स्थित है. यह द्वीप रामेश्वरम (भारत) से लगभग 19 किलोमीटर और जाफना (श्रीलंका) से 16 किलोमीटर दूर है. यह क्षेत्र भारत और श्रीलंका के बीच मछुआरों के पारंपरिक गतिविधि क्षेत्र में आता है.
1974 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और श्रीलंका की प्रधानमंत्री सिरीमावो भंडारनायके के बीच हुए समझौते के तहत यह द्वीप श्रीलंका को सौंपा गया. 1976 के एक अतिरिक्त समझौते में समुद्री सीमा स्पष्ट की गई और भारतीय मछुआरों को सीमित रूप से द्वीप तक जाने की छूट दी गई थी.
भारत में क्यों उठ रही है पुनः दावे की मांग?
समझौते के समय से ही तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों और मछुआरा समुदाय में इस सौंपने को लेकर असंतोष था. उनका तर्क है कि यह द्वीप ऐतिहासिक रूप से रामनाड जमींदारी का हिस्सा था और तमिल मछुआरे सदियों से इस क्षेत्र में मछली पकड़ते आ रहे हैं.
1991 में तमिलनाडु विधानसभा ने इस द्वीप को भारत में पुनः शामिल करने की मांग करते हुए प्रस्ताव पारित किया. इसके बाद से समय-समय पर यह मुद्दा चुनावों और क्षेत्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बनता रहा है.
श्रीलंका की चिंताएं: समुद्री संसाधनों पर दबाव
श्रीलंकाई सरकार का तर्क है कि विदेशी मछुआरों की लगातार घुसपैठ से उनके समुद्री संसाधन — विशेष रूप से मछलियां और समुद्री वनस्पतियां — प्रभावित हो रही हैं. साथ ही, श्रीलंका का कहना है कि स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर भी असर पड़ रहा है.
श्रीलंका के विदेश मंत्री के अनुसार, “हम राजनयिक रास्तों से समाधान के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून और 1974 के समझौते के अनुसार कच्चाथीवू पर हमारा अधिकार स्थापित है.”
कूटनीतिक और संवेदनशील मुद्दा बना द्वीप
हाल के वर्षों में, भारत और श्रीलंका के बीच मछुआरों की गिरफ्तारियों, मछली पकड़ने के अधिकारों और सीमाई उल्लंघनों को लेकर तनाव बढ़ा है. भारत सरकार ने कई बार इस मुद्दे को द्विपक्षीय वार्ता में उठाया है और शांति और समझौते के तहत समाधान की बात की है.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री समेत कई राजनीतिक नेताओं ने केंद्र सरकार से कच्चाथीवू को पुनः भारत में मिलाने की मांग की है, जिसे श्रीलंका पूरी तरह खारिज करता आया है.
धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी है मुद्दे का हिस्सा
कच्चाथीवू द्वीप पर स्थित सेंट एंथनी चर्च धार्मिक रूप से तमिल समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है. हर साल फरवरी में हजारों भारतीय तीर्थयात्री रामेश्वरम से नावों के जरिए द्वीप पहुंचते हैं और वहां विशेष प्रार्थना करते हैं.
यह धार्मिक जुड़ाव द्वीप को केवल सामरिक या आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व भी देता है.
अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री सीमाएं क्या कहती हैं?
अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के अनुसार, समुद्री सीमाएं संप्रभुता का निर्धारण करती हैं, और किसी देश की सहमति के बिना उस क्षेत्र में मछली पकड़ना अवैध माना जाता है. 1974 और 1976 के समझौते के तहत भारत ने द्वीप पर अधिकार छोड़ दिया था, लेकिन मछुआरों को पारंपरिक अधिकार दिए गए थे — जिन्हें बाद में श्रीलंका द्वारा सीमित कर दिया गया.
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