पलक झपकते तबाह होंगे ड्रोन और फाइटर जेट, रडार को कर देगा कबाड़, जानें Akash-NG मिसाइल सिस्‍टम की ताकत

21वीं सदी के युद्ध अब पहले जैसे नहीं रहे. जहां पहले सेना का मतलब ज़मीन पर लड़ी जाने वाली लड़ाई मानी जाती थी, अब परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है.

Strengths and Features of Akash-NG Missile System
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

21वीं सदी के युद्ध अब पहले जैसे नहीं रहे. जहां पहले सेना का मतलब ज़मीन पर लड़ी जाने वाली लड़ाई मानी जाती थी, अब परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है. आधुनिक युद्धों में वायु शक्ति निर्णायक बन चुकी है, चाहे बात रूस-यूक्रेन युद्ध की हो, या फिर इज़राइल-ईरान संघर्ष की. एयरफोर्स और नेवी अब केवल सहायक भूमिका में नहीं हैं, बल्कि वे किसी भी सैन्य ऑपरेशन के केंद्र में आ चुकी हैं.

भारत ने भी इस रणनीतिक बदलाव को भांपते हुए अपनी वायु सुरक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाने की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाए हैं. रूस से खरीदे गए S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती इस दिशा में एक बड़ा कदम था. लेकिन अब भारत अपनी स्वदेशी वायु रक्षा क्षमता को एक नई ऊंचाई पर ले जाने की तैयारी में है. इसका सबसे ताज़ा और प्रभावशाली उदाहरण है: Akash-NG मिसाइल प्रणाली, जिसे DRDO (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) ने हाल ही में परीक्षण के बाद पूरी तरह सफल घोषित किया है.

क्या है Akash-NG?

Akash-NG यानी "अकाश नेक्स्ट जेनरेशन" एक स्वदेशी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली (Surface to Air Missile System) है, जो DRDO द्वारा विकसित की गई है. यह पारंपरिक रडार-निर्भर सिस्टम्स से कहीं आगे की तकनीक पर आधारित है और इसका उद्देश्य हवाई खतरों जैसे कि ड्रोन, फाइटर जेट, हेलिकॉप्टर या क्रूज़ मिसाइलों को बेहद तेज़ी और सटीकता से नष्ट करना है.

ओडिशा में हुआ सफल परीक्षण

जून 2025 में, ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (ITR) में Akash-NG का एक महत्वपूर्ण परीक्षण किया गया. इस परीक्षण में मिसाइल को एक हाई-स्पीड ‘बैंशी’ ड्रोन को निशाना बनाने के लिए लॉन्च किया गया था. खास बात यह रही कि इस पूरी प्रक्रिया में कोई भी रडार सिस्टम सक्रिय नहीं किया गया.

EOTS का उपयोग: चुपचाप, लेकिन घातक

इस परीक्षण में मिसाइल ने अपने लक्ष्य की पहचान और मार्गदर्शन के लिए Electro-Optical Tracking System (EOTS) का उपयोग किया, जो पूरी तरह से पैसिव होता है. इसका मतलब है कि इस प्रणाली ने कोई रेडिएशन सिग्नल उत्सर्जित नहीं किया, जिससे दुश्मन के रडार वार्निंग रिसीवर (Radar Warning Receivers – RWR) इसे पहचान ही नहीं पाए. यह प्रणाली विशेष रूप से उन परिस्थितियों के लिए डिज़ाइन की गई है, जहां दुश्मन की ओर से एंटी-रेडिएशन मिसाइलों (Anti-Radiation Missiles – ARM) का खतरा हो.

कैसे काम करता है यह सिस्टम?

  • लक्ष्य की प्रारंभिक जानकारी भारतीय वायुसेना के Integrated Air Command and Control System (IACCS) से प्राप्त होती है.
  • इसके बाद, EOTS लक्ष्य को विज़ुअली ट्रैक करता है.
  • मिसाइल को पूरी तरह से ईओटीएस गाइड करता है, बिना रडार की मदद के.
  • यह मिसाइल Line-of-Sight (LOS) पर कार्य करती है और कुछ ही सेकंड में लक्ष्य को सटीकता से नष्ट कर देती है.

टेलीमेट्री डेटा से पता चला है कि इस परीक्षण में मिसाइल ने बहुत ही कम विचलन के साथ अपने लक्ष्य को भेदा और उसे सीधे हवा में तबाह कर दिया.

क्यों है Akash-NG खास?

  • 45 किलोमीटर तक की रेंज में हवा में मौजूद किसी भी खतरे को सटीकता से नष्ट करने की क्षमता.
  • रडार की आवश्यकता नहीं, जिससे पहचान से बचना आसान.
  • EOTS आधारित गाइडेंस, स्टील्थ और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के युग में अत्यंत उपयोगी.
  • UAV Swarm, स्टील्थ एयरक्राफ्ट और हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों जैसे भविष्य के खतरों से निपटने में सक्षम.

भारतीय वायु रक्षा का भविष्य

Akash-NG मिसाइल प्रणाली सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन क्षमता का प्रतीक भी है. इससे पहले भारत ने रूस से S-400 जैसे महंगे सिस्टम खरीदे थे, लेकिन अब DRDO जैसी संस्थाएं Made-in-India समाधानों के साथ आगे आ रही हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि ईओटीएस जैसी पैसिव गाइडेंस प्रणाली आने वाले वर्षों में दुनिया भर की एयर डिफेंस रणनीतियों को बदल सकती है. पारंपरिक रडार पर निर्भर सिस्टम, जो दुश्मन को अपनी मौजूदगी का संकेत देते हैं, उनकी तुलना में यह तकनीक कहीं अधिक ‘साइलेंट किलर’ साबित हो सकती है.

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