काठमांडू: नेपाल एक बार फिर इतिहास के मोड़ पर खड़ा है. देश में तीन दिन पहले हुए राजनीतिक तख्तापलट और उसके बाद मची उथल-पुथल के बीच अब अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में सुशीला कार्की के नाम पर मुहर लग चुकी है. आज रात 8:45 बजे, राष्ट्रपति भवन में उनका शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जाएगा.
देश की संवैधानिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक ढांचे को फिर से स्थापित करने की कोशिशों के तहत सुशीला कार्की को यह अहम ज़िम्मेदारी सौंपी जा रही है. वे नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं और अब वे नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री बनने जा रही हैं, जो अपने-आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है.
तख्तापलट के बाद संवेदनशील स्थिति
नेपाल में 9 सितंबर को हुए Gen-Z आंदोलन ने देश की राजनीति को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया. युवा आंदोलनकारियों ने राजधानी काठमांडू में हिंसक प्रदर्शन करते हुए संसद भवन, राष्ट्रपति निवास, और तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली के निजी आवास पर धावा बोला. कई स्थानों पर आगजनी हुई और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाया गया.
इस हिंसा में अब तक 51 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1000 से अधिक लोग घायल हुए हैं. हालात इतने बेकाबू हो गए कि सेना को तैनात करना पड़ा और देश भर में आपात स्थिति जैसी स्थिति बन गई.
राष्ट्रपति का बड़ा फैसला
राजनीतिक दबाव और जनाक्रोश को देखते हुए, नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने बड़ा कदम उठाते हुए संसद को भंग करने की घोषणा कर दी. यह फैसला उस समय लिया गया जब सेना, राष्ट्रपति और युवा आंदोलनकारियों के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की गुप्त बैठकों का आयोजन हुआ.
इन बैठकों के बाद यह सहमति बनी कि देश को जल्द ही एक नई राजनीतिक दिशा देने के लिए एक तटस्थ और अनुभवी नेतृत्व की आवश्यकता है. ऐसे में सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में चुना गया.
कौन हैं सुशीला कार्की?
सुशीला कार्की एक ऐसी शख्सियत हैं जो कानून, न्याय और नैतिकता की मिसाल रही हैं. वे 11 जुलाई 2016 से 6 जून 2017 तक नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस रही थीं. उनका कार्यकाल न्यायिक स्वतंत्रता और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख के लिए याद किया जाता है.
उन्होंने भारत के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की थी और 1979 में वकालत के पेशे में कदम रखा. उनके कानूनी करियर की शुरुआत साधारण थी, लेकिन उनकी मेहनत और निडर सोच ने उन्हें नेपाल के सबसे ऊंचे न्यायिक पद तक पहुंचाया.
हालांकि 2017 में उनके खिलाफ महाभियोग भी लाया गया था, जिसमें उन पर पक्षपात और कार्यपालिका में हस्तक्षेप जैसे आरोप लगाए गए थे. लेकिन उनके समर्थकों का मानना है कि ये आरोप राजनीतिक रूप से प्रेरित थे, क्योंकि उन्होंने कई बड़े नेताओं के खिलाफ कड़े फैसले दिए थे.
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