वॉशिंगटन DC: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर अमेरिका ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया है. अमेरिकी सरकार ने साफ कर दिया है कि जो भी विदेशी अधिकारी या नागरिक अमेरिकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अमेरिकी लोगों की पोस्ट को सेंसर करने की कोशिश करेगा, उसे अमेरिका में कदम रखने की इजाज़त नहीं दी जाएगी. इस तरह का कड़ा वीजा प्रतिबंध लागू करने वाला अमेरिका दुनिया का पहला देश बन गया है.
सेंसरशिप करने वालों की अमेरिका में नो एंट्री
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बुधवार को वॉशिंगटन में इस नीति की घोषणा की. उन्होंने कहा, "अगर कोई विदेशी अधिकारी अमेरिकी नागरिक को धमकाकर या दबाव डालकर उसकी सोशल मीडिया पोस्ट को हटवाने की कोशिश करता है, तो यह सीधे तौर पर अमेरिका की मूलभूत आज़ादी पर हमला है. अब ऐसे लोगों को अमेरिका का वीजा नहीं मिलेगा."
रुबियो ने यह स्पष्ट किया कि यह पॉलिसी उन सभी विदेशी नागरिकों पर लागू होगी जो अमेरिकी टेक प्लेटफॉर्म्स — जैसे कि Facebook, Instagram, X, YouTube या Google — पर अमेरिकी नागरिकों के कंटेंट को हटाने या नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं.
किसे माना जाएगा दोषी?
रुबियो के अनुसार, कई विदेशी अधिकारियों ने अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग करते हुए अमेरिकी टेक कंपनियों पर सेंसरशिप का दबाव बनाया. कुछ मामलों में, अमेरिकी नागरिकों को उनके पोस्ट के लिए गिरफ्तारी तक की धमकी दी गई.
उन्होंने कहा, "अगर कोई अमेरिकी व्यक्ति अमेरिका में बैठकर सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट करता है, तो कोई विदेशी सरकार उस पोस्ट को हटाने के लिए ना तो कह सकती है और ना ही धमका सकती है."
हालांकि, अमेरिकी सरकार ने किसी विशेष देश या अधिकारी का नाम नहीं लिया, लेकिन यह संकेत जरूर दिया कि दुनिया के कुछ हिस्सों में बढ़ती डिजिटल सेंसरशिप पर उनकी नजर बनी हुई है.
टेक कंपनियां तो अमेरिकी, लेकिन दबाव वैश्विक
आज दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनियां अमेरिका में बनी हैं, जैसे कि:
इन कंपनियों पर कई बार यूरोपीय और एशियाई देशों द्वारा कानूनी दबाव बनाया गया है. कुछ सरकारें न केवल कंटेंट हटाने के लिए नोटिस देती हैं, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ जुर्माने और कानूनी कार्रवाई भी कर रही हैं.
अमेरिका का ताज़ा कदम इन तमाम गतिविधियों के खिलाफ रक्षात्मक और आक्रामक नीति का संकेत है.
फ्री स्पीच की रक्षा या डिजिटल टकराव की शुरुआत?
इस कदम को अमेरिका द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल सिद्धांत की रक्षा के रूप में देखा जा रहा है. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय संबंधों और डिजिटल डिप्लोमेसी पर भी पड़ेगा.
संभावना है कि जिन देशों ने अमेरिकी सोशल मीडिया कंपनियों पर सेंसरशिप को लेकर शिकंजा कसा है, वे इस फैसले से असहज हो सकते हैं.
ये भी पढ़ें- चीन ने अमेरिकी रक्षामंत्री के फिलीपींस दौरे से पहले तैनात किया H-6 बॉम्बर्स, आईं सैटेलाइट तस्वीरें