US India Relation: चीन के तियानजिन शहर में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन ने इस बार वैश्विक राजनीति में खासा हलचल मचा दी है. वैश्विक तनाव के बीच, खासकर अमेरिका द्वारा भारत सहित कई देशों पर टैरिफ लगाने की नीति के कारण बढ़े हुए विवादों के बीच यह सम्मेलन विश्व की निगाहों का केंद्र बना रहा. इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति और रूस-भारत-चीन के बीच बढ़ती नजदीकियों ने अमेरिका की कड़ी नीति में थोड़ी नरमी का संकेत दिया है.
भारत में जारी एससीओ सम्मेलन के दौरान, नई दिल्ली में स्थित अमेरिकी दूतावास ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर एक संदेश साझा किया जिसमें अमेरिका और भारत के बीच साझेदारी को “21वीं सदी का निर्णायक रिश्ता” करार दिया गया. दूतावास ने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग निरंतर मजबूत हो रहा है, चाहे वह नवाचार हो, उद्यमिता या रक्षा क्षेत्र. इस साझेदारी को दोनों देशों की स्थायी मित्रता का प्रतीक बताया गया है जो भविष्य की प्रगति को ऊर्जा प्रदान कर रही है.
टैरिफ को लेकर जारी तनाव
हालांकि हाल के महीनों में अमेरिका ने भारत पर कच्चे तेल के आयात को लेकर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिया है. अमेरिका का आरोप है कि भारत रूस से तेल खरीद रहा है जिससे यूक्रेन युद्ध को वित्तीय मदद मिल रही है. भारत ने इस टैरिफ को अनुचित और गैर-वैज्ञानिक करार देते हुए इसका विरोध किया है. अमेरिका की इस नीति ने दोनों देशों के बीच कुछ मतभेद पैदा किए हैं, लेकिन अब यह संकेत मिलने लगे हैं कि दोनों देश इस रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं.
चीन की कड़ी चेतावनी
वहीं, एससीओ शिखर सम्मेलन के मंच से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिका को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि आज के दौर में आधिपत्यवादी सोच और सत्ता की राजनीति को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि एससीओ सदस्य देश कानून प्रवर्तन और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देते हुए बाहरी हस्तक्षेप का कड़ा विरोध करते हैं. शी जिनपिंग ने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखने पर जोर देते हुए सभ्यताओं के बीच समावेशिता और संवाद की अहमियत पर बल दिया.
नया वैश्विक समीकरण बन रहा है
एससीओ शिखर सम्मेलन ने वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में नए समीकरणों को जन्म दिया है. भारत-चीन-रूस के बढ़ते समीपता और अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों में नरमी की यह कहानी, विश्व की राजनीति में संतुलन के लिए नए रास्ते खोल सकती है. अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में ये देश किस दिशा में अपने संबंधों को लेकर कदम बढ़ाते हैं और वैश्विक तनाव का समाधान कैसे निकलता है.
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