अमेरिकी सेना में दाढ़ी रखने पर प्रतिबंध, ट्रंप ने बताई इसके पीछे की वजह, मुस्लिम और सिख सैनिक नाराज

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई वाले प्रशासन ने एक ऐसा विवादास्पद फैसला लिया है, जिसने अमेरिकी सेना में सेवा दे रहे धार्मिक अल्पसंख्यकों विशेषकर सिख, मुस्लिम और ऑर्थोडॉक्स यहूदी सैनिकों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है.

Trump banned beard in US Army and gave reason
प्रतिकात्मक तस्वीर/ FreePik

वॉशिंगटन डीसी: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई वाले प्रशासन ने एक ऐसा विवादास्पद फैसला लिया है, जिसने अमेरिकी सेना में सेवा दे रहे धार्मिक अल्पसंख्यकों विशेषकर सिख, मुस्लिम और ऑर्थोडॉक्स यहूदी सैनिकों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है.

दरअसल, अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने हाल ही में वर्जीनिया स्थित मरीन कॉर्प्स बेस क्वांटिको में एक भाषण के दौरान सेना में ‘अनुशासन और घातक क्षमता’ को बहाल करने की बात करते हुए चेहरे पर दाढ़ी रखने की छूट को समाप्त करने की घोषणा की. इसके तुरंत बाद पेंटागन ने एक आधिकारिक ज्ञापन (मेमो) जारी किया, जिसमें सभी सैन्य शाखाओं को 2010 से पहले के मानकों पर वापस लौटने का आदेश दिया गया. इसका सीधा मतलब है कि अब दाढ़ी रखने की अनुमति खत्म कर दी गई है.

क्या कहता है नियम?

  • पेंटागन द्वारा जारी नए आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि, "चेहरे के बालों की धार्मिक या व्यक्तिगत छूट आमतौर पर स्वीकृत नहीं की जाएगी."
  • सभी सैन्य यूनिट्स को 60 दिनों के भीतर कार्य योजना तैयार करनी होगी और 90 दिनों में इस नियम को पूरी तरह लागू करना होगा.
  • केवल स्पेशल ऑपरेशंस यूनिट्स को सीमित और अस्थायी छूट दी जा सकती है, लेकिन उन्हें भी मिशन से पहले क्लीन-शेव होना अनिवार्य होगा.
  • साथ ही अत्यधिक वजन वाले उच्च अधिकारी, यानी मोटे जनरलों को वजन घटाने की चेतावनी भी दी गई है.

धार्मिक समुदायों में विरोध की लहर

इस फैसले से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले समुदायों में सिख, मुस्लिम और ऑर्थोडॉक्स यहूदी सैनिक शामिल हैं, जो धार्मिक कारणों से दाढ़ी और अन्य प्रतीक धारण करते हैं.

सिख कोएलिशन (The Sikh Coalition) ने इस आदेश की तीखी आलोचना करते हुए कहा है कि यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है. संगठन की तरफ से जारी बयान में कहा गया, "हम गहरे रोष और चिंता में हैं. यह फैसला उन सैनिकों को हाशिए पर डाल देगा जो अपने धर्म के अनुसार सेवा कर रहे हैं."

एक सिख सैनिक ने सोशल मीडिया पर लिखा, "मेरे केश मेरी पहचान हैं. मुझे अपने धर्म और करियर में से किसी एक को चुनने पर मजबूर किया जा रहा है."

अमेरिकी सेना में सिखों का लंबा इतिहास

अमेरिकी सेना में सिख समुदाय की भागीदारी कोई नई बात नहीं है. पहले विश्व युद्ध के समय भी सिख सैनिक अमेरिकी सेना का हिस्सा थे.

  • 1917 में भगत सिंह थिंड पहले सिख थे जिन्हें पगड़ी पहनकर सेवा की अनुमति मिली थी.
  • 1980 के दशक में नियम कठोर हो गए और धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
  • लेकिन 2010 के बाद स्थितियों में बदलाव आया.
  • कैप्टन सिमरनप्रीत सिंह लांबा और मेजर डॉ. कमलजीत सिंह कलसी को धार्मिक छूट मिली.

2017 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान दाढ़ी, पगड़ी और अन्य धार्मिक प्रतीकों को अनुमति दी गई थी, जिसे अब फिर से पलट दिया गया है.

ट्रंप प्रशासन का तर्क: एकरूपता और सुरक्षा

रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और ट्रंप प्रशासन का दावा है कि यह फैसला सैन्य अनुशासन, एकरूपता और सुरक्षा के मद्देनज़र लिया गया है. उनकी दलील है कि दाढ़ी गैस मास्क के सही इस्तेमाल में रुकावट बन सकती है, जिससे सैनिकों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है.

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सभी सैनिकों के लिए एक जैसे मानक होना ज़रूरी है ताकि यूनिट की एकता और परिचालन क्षमता बनी रहे.

हेगसेथ ने अपने भाषण में कहा, "हम सेना को एक बार फिर वैसा बनाना चाहते हैं, जैसा यह होना चाहिए- अनुशासित, शक्तिशाली और प्रभावी. किसी भी विशेष छूट से यूनिट की एकता और परिचालन क्षमता प्रभावित हो सकती है."

सेना में धार्मिक विविधता पर खतरा?

इस नए नियम को लेकर चिंता जताई जा रही है कि यह धार्मिक विविधता और समावेशन के उस विचार के खिलाफ है जिसे अमेरिकी सेना ने दशकों की मेहनत से अपनाया है.

अमेरिका के संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है, और कई मानवाधिकार संगठन तथा सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि यह आदेश सैनिकों को उनके विश्वास का पालन करने से रोकेगा.

एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने कहा, "दाढ़ी कोई केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं है, यह कुछ समुदायों के लिए धार्मिक पहचान है. जब आप उनसे यह छीनते हैं, तो आप उन्हें उनकी जड़ों से काटते हैं."

मुस्लिम और यहूदी समुदायों की भी प्रतिक्रिया

सिखों के अलावा मुस्लिम और ऑर्थोडॉक्स यहूदी सैनिकों ने भी अपनी नाराजगी व्यक्त की है. कई मुस्लिम सैनिकों ने इस फैसले को धार्मिक भेदभाव बताया है और कहा है कि इससे उन्हें असहज महसूस हो रहा है.

एक मुस्लिम सैनिक ने कहा, "हम अमेरिका की रक्षा करने आए हैं, लेकिन अब हमें अपनी पहचान छिपाने को कहा जा रहा है. यह हमारी आस्था और संविधान दोनों के खिलाफ है."

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