Middle East: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी और पश्चिम एशिया मामलों में विशेष दूत टॉम बराक के हालिया बयान ने एक बार फिर मिडिल ईस्ट की राजनीतिक और सामाजिक संरचना पर दुनिया भर में बहस छेड़ दी है. सऊदी मीडिया चैनल Asharq News को दिए गए इंटरव्यू में बराक ने कहा, "मिडिल ईस्ट नाम की कोई जगह नहीं है, वहां बस कबीलों और गांवों का एक बिखरा हुआ ढांचा है."
बराक का यह बयान न केवल भू-राजनीतिक सोच को चुनौती देने वाला है, बल्कि यह उन प्रयासों के बीच आया है जब अमेरिकी नेतृत्व वाला पश्चिम, खासकर ट्रंप प्रशासन, क्षेत्र में गाजा युद्ध को रोकने, इजरायल-अरब संबंधों को सुधारने, और सीरिया संकट का हल खोजने में जुटा है. ऐसे में यह बयान ना केवल अरब राष्ट्रवाद को आहत करता है, बल्कि स्थानीय नेतृत्व की वैधता और औपनिवेशिक विरासत पर भी नए सवाल खड़े करता है.
"मिडिल ईस्ट" एक नक्शे की रेखा या काल्पनिक पहचान?
बराक के अनुसार, जिस क्षेत्र को आज दुनिया मिडिल ईस्ट कहती है, वह राजनीतिक रूप से एकीकृत क्षेत्र नहीं है, बल्कि "व्यक्ति से लेकर परिवार, फिर कबीले, फिर धर्म और अंत में राज्य तक की एक लंबी सामाजिक श्रृंखला" के रूप में देखा जाना चाहिए.
उन्होंने यह भी जोड़ा, "यह सोचना गलत है कि 100 से ज्यादा जातीय, धार्मिक और भाषाई समूहों वाला यह क्षेत्र यूरोप की तरह कभी एक राष्ट्रीय पहचान के तहत संगठित हो सकता है." उनका इशारा सीधे उस औपनिवेशिक विरासत की ओर था जिसमें ब्रिटेन और फ्रांस ने 1916 में साइक्स-पिको समझौते के ज़रिए ओटोमन साम्राज्य को कृत्रिम रूप से बांट दिया और नई सीमाएं खींच दीं, सीमाएं जो ज़मीन पर मौजूद सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने से मेल नहीं खाती थीं.
साइक्स-पिको समझौते की विरासत: एक विखंडित क्षेत्र
1916 में किया गया साइक्स-पिको समझौता दरअसल यूरोप की औपनिवेशिक शक्तियों, ब्रिटेन और फ्रांस के बीच एक गुप्त समझौता था, जिसमें रूस और इटली की सहमति भी शामिल थी. इसके तहत यह तय हुआ था कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ओटोमन साम्राज्य टूटेगा, तब मिडिल ईस्ट के हिस्सों को किस तरह बांटा जाएगा.
इन कृत्रिम सीमाओं का सबसे बड़ा नुकसान जातीय समूहों को हुआ, खासकर कुर्दों को, जिन्हें इराक, ईरान, सीरिया और तुर्की में अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया गया. नतीजतन इराक में सद्दाम हुसैन ने कुर्दों पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया और हजारों लोगों की हत्या कर दी. तुर्की और सीरिया में भी कुर्दों को राजनीतिक पहचान और सांस्कृतिक अधिकार नहीं दिए गए.
इन सबका नतीजा लगातार विद्रोह, संघर्ष और अस्थिरता रहा, जो आज भी जारी है. बराक का यह कहना कि मिडिल ईस्ट में कभी एक राजनीतिक समझदारी नहीं बन सकती, इस इतिहास की ओर इशारा करता है कि जिन देशों को बनाया गया, उनकी नींव ही सामाजिक विभाजन और बाहरी हस्तक्षेप पर टिकी थी.
अरब नेताओं में असहजता
टॉम बराक का बयान ऐसे समय पर आया है जब ट्रंप प्रशासन मिडिल ईस्ट में अब्राहम समझौते (Abraham Accords) को विस्तार देने की कोशिश कर रहा है, जिसमें अरब देशों और इजरायल के बीच संबंध सामान्य करने की पहल की गई है.
लेकिन बराक के बयान से अरब देशों में गंभीर असहजता पैदा हो गई है. एक तरफ जहां यह कटु सत्य की तरह सामने आया है, वहीं दूसरी तरफ इसे एक अपमानजनक टिप्पणी भी माना जा रहा है. दशकों से 'मिडिल ईस्ट' एक राजनीतिक यूनिट के रूप में वैश्विक मंचों पर प्रस्तुत होता रहा है. लेकिन अब जब उसी की वैधता पर सवाल उठने लगे हैं, तो इसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं.
क्या सिर्फ साइक्स-पिको जिम्मेदार है?
हालांकि बराक के बयान को ऐतिहासिक दृष्टि से कई विद्वानों का समर्थन भी मिला है, लेकिन कुछ विशेषज्ञों ने इसे ओवरसिंप्लिफिकेशन (अति-सरलीकरण) बताया है. उनका कहना है कि सिर्फ ब्रिटेन और फ्रांस को दोष देना आसान है, लेकिन स्थानीय शासकों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
वे उदाहरण देते हैं:
इनके मुताबिक, सत्ता की लालच और शासन की असहिष्णुता ने भी इस क्षेत्र को बर्बादी के कगार तक पहुंचाया.
क्या मिडिल ईस्ट की नई परिभाषा बनेगी?
बराक का यह बयान शायद सिर्फ व्यक्तिगत विचार न होकर एक नई अमेरिकी सोच का प्रतिबिंब भी हो सकता है. अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए यह क्षेत्र ऊर्जा, सैन्य और रणनीतिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, खासकर गाजा युद्ध और सीरिया संकट के बाद, यह स्पष्ट हो गया है कि मिडिल ईस्ट को पुराने ढांचे में समझना अब कारगर नहीं है.
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