Taliban Expose Pakistan: पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के बीच तुर्की में दो दिन तक चली शांति वार्ता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी. इस वार्ता का उद्देश्य दोनों देशों के बीच बिगड़ते रिश्तों को सुधारना और सीमाई तनाव को कम करना था, लेकिन बैठक के दौरान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को लेकर दोनों पक्षों में तीखी नोकझोंक हुई, जिसके बाद वार्ता बिना किसी सहमति के समाप्त हो गई. फिलहाल दोनों देशों ने अगले दौर की बैठक को टालने का फैसला लिया है.
पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार टीटीपी आतंकियों को पनाह दे रही है, जो पाकिस्तानी सेना और नागरिक ठिकानों पर हमले कर रहे हैं. दूसरी ओर, अफगान तालिबान ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है. अफगान तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने एक आधिकारिक बयान जारी कर पाकिस्तान की नीतियों पर सीधा हमला बोला. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सेना खुद टीटीपी को जन्म देने की जिम्मेदार है और अब उसी संगठन को लेकर अफगानिस्तान पर झूठे आरोप लगा रही है.
“टीटीपी पाकिस्तान की अपनी उपज”
मुजाहिद ने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान के कुछ सैन्य गुट अफगानिस्तान में एक मजबूत तालिबान सरकार को अपने हितों के खिलाफ मानते हैं. उन्होंने कहा, “वर्षों तक पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की अस्थिरता से राजनीतिक और सामरिक फायदा उठाया. अब जब अफगानिस्तान स्थिरता की ओर बढ़ रहा है, तो पाकिस्तान की सेना टीटीपी का नाम लेकर नए बहाने गढ़ रही है.” उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान यह गलत धारणा फैला रहा है कि तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद टीटीपी की ताकत बढ़ी है, जबकि यह संगठन 2002 से सक्रिय है.
तालिबान ने दिए ऐतिहासिक उदाहरण
तालिबान प्रवक्ता ने कहा कि टीटीपी का गठन उस समय हुआ था जब 2001 में अमेरिका ने आतंक के खिलाफ युद्ध शुरू किया और पाकिस्तान ने अमेरिकी गठबंधन का हिस्सा बनते हुए अपने ही कबायली इलाकों में सैन्य कार्रवाई शुरू की.
उन्होंने बताया, “मार्च 2002 में पाकिस्तानी सेना ने दक्षिण वजीरिस्तान, उत्तरी वजीरिस्तान और ओरकजई इलाकों में ‘ऑपरेशन अल-मिजान’ शुरू किया था. इसी दौरान टीटीपी का गठन हुआ और उसने पाकिस्तान सरकार के खिलाफ हथियार उठा लिए.” तालिबान ने यह भी कहा कि इस पूरी अवधि में अफगानिस्तान की तालिबान सरकार अस्तित्व में नहीं थी, इसलिए टीटीपी के उदय को उनसे जोड़ना तथ्यों के विपरीत है.
“यह पाकिस्तान की आंतरिक समस्या है”
मुजाहिद ने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तानी सेना और पश्तून कबीलों के बीच दशकों पुराना संघर्ष इस बात का सबूत है कि यह पाकिस्तान की अपनी आंतरिक समस्या है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान खुद मान चुका है कि आतंकवाद विरोधी अभियानों में 80,000 से ज्यादा नागरिक और सैनिक मारे गए, जबकि यह सब तब हुआ जब अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता में नहीं था. तालिबान के मुताबिक, “अगर टीटीपी की गतिविधियों का जिम्मेदार कोई है, तो वह पाकिस्तान की नीतियां हैं, न कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार.”
तालिबान ने दिए कई ऐतिहासिक हमलों के उदाहरण
तालिबान प्रवक्ता ने अपने बयान में कई पुराने उदाहरण देते हुए बताया कि टीटीपी की गतिविधियां तालिबान के आने से पहले ही पाकिस्तान को झकझोर चुकी थीं. अगस्त 2007 में टीटीपी ने पाकिस्तानी सेना के 300 से ज्यादा सैनिकों को बंदी बना लिया था. 2008 में पंजाब प्रांत में हुए हमलों में दर्जनों सुरक्षाकर्मी मारे गए थे.
2009 से 2011 के बीच भी टीटीपी ने कई बार पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था. इन घटनाओं का हवाला देते हुए तालिबान ने कहा कि “अगर तालिबान सरकार इन हमलों के दौरान सत्ता में नहीं थी, तो फिर मौजूदा समय में उस पर दोषारोपण का कोई आधार नहीं बनता.”
शांति वार्ता में बढ़ा तनाव
तुर्की में आयोजित यह शांति वार्ता पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच रिश्तों में सुधार के लिए आयोजित की गई थी. लेकिन सूत्रों के अनुसार, वार्ता के दूसरे दिन पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने टीटीपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की, जिस पर अफगान पक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी. इसके बाद माहौल इतना बिगड़ा कि दोनों देशों ने वार्ता को बीच में ही खत्म करने का निर्णय लिया.
सीमा पार आतंकवाद और बढ़ता तनाव
हाल के महीनों में पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों, खासतौर पर वजीरिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में टीटीपी के हमलों में तेजी आई है. पाकिस्तान का दावा है कि इन आतंकियों को अफगानिस्तान की जमीन से सहयोग मिल रहा है.
वहीं, तालिबान का कहना है कि वह अपने इलाके से किसी भी तरह की हिंसा को समर्थन नहीं देता और पाकिस्तान को अपने भीतर की असंतुष्टि और नीतिगत विफलताओं का हल खुद ढूंढना चाहिए.
भविष्य की वार्ता पर अनिश्चितता
तुर्की में वार्ता के असफल होने के बाद अब दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ने की संभावना है. पाकिस्तान पहले ही अफगान सीमा पर अतिरिक्त सैनिक तैनात कर चुका है और व्यापारिक रास्तों को सख्ती से नियंत्रित कर रहा है. काबुल से मिली जानकारी के अनुसार, अफगान तालिबान सरकार अब किसी नए दौर की वार्ता के लिए तैयार नहीं है, जब तक कि पाकिस्तान अपने “गलत आरोपों” को वापस नहीं लेता.
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