India Skip Turkey National Day: भारत और तुर्की के बीच बढ़ते तनाव ने अब औपचारिक रूप ले लिया है. 29 अक्टूबर को अंकारा में आयोजित तुर्की के राष्ट्रीय दिवस समारोह से भारत ने पूरी तरह दूरी बना ली. पिछले साल इस कार्यक्रम में भारत के सचिव स्तर के प्रतिनिधि ने हिस्सा लिया था, लेकिन इस बार मोदी सरकार ने कोई भी आधिकारिक प्रतिनिधि नहीं भेजा.
कूटनीतिक हलकों में इसे तुर्की के रवैये के प्रति भारत की सख्त नाराज़गी का संकेत माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, यह निर्णय भारत सरकार के उच्च स्तर पर लिया गया ताकि अंकारा को साफ संदेश दिया जा सके कि नई दिल्ली अब कश्मीर पर विदेशी बयानबाज़ी को बर्दाश्त नहीं करेगी.
एर्दोगन बार-बार उठाते रहे हैं कश्मीर मुद्दा
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन लंबे समय से पाकिस्तान का समर्थन करते रहे हैं. उन्होंने कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाया, जिसे भारत अपने आंतरिक मामलों में दखल के रूप में देखता है.
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र के दौरान भी एर्दोगन ने भारत की नीतियों की आलोचना की थी. इसके जवाब में भारत ने कहा था, “कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है, और इसमें किसी बाहरी देश की कोई भूमिका नहीं.” विशेषज्ञों का कहना है कि एर्दोगन की यह रणनीति तुर्की को इस्लामी देशों के नेतृत्व की दौड़ में आगे लाने की कोशिश है, लेकिन इसके चलते उसके भारत से संबंध लगातार बिगड़ते जा रहे हैं.
ऑपरेशन सिंदूर के बाद से तनाव बढ़ा
भारत और तुर्की के बीच रिश्ते पहले से ही तनावपूर्ण थे, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान स्थिति और अधिक गंभीर हो गई. इस ऑपरेशन में पाकिस्तान के खिलाफ भारत की सैन्य रणनीति को लेकर एर्दोगन ने शहबाज-मुनीर सरकार का खुलकर समर्थन किया था.
भारतीय विश्लेषकों के मुताबिक, तुर्की का यह रुख भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के खिलाफ जाता है. यही कारण है कि भारत ने अब “कूटनीतिक ठंडापन” अपनाने का फैसला किया है.
मोदी का साइप्रस दौरा, तुर्की को अप्रत्यक्ष संदेश
जून 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस यात्रा को राजनयिक विशेषज्ञों ने तुर्की के लिए एक भू-राजनीतिक जवाब बताया था. साइप्रस लंबे समय से उत्तरी हिस्से पर तुर्की के कब्जे का विरोध करता रहा है. मोदी सरकार ने साइप्रस की संप्रभुता का खुला समर्थन कर यह संकेत दिया कि भारत अब तुर्की की नीतियों के खिलाफवैकल्पिक रणनीतिक गठबंधन बनाने को तैयार है.
नई दिल्ली का स्पष्ट संदेश, सम्मान दो या दूरी रखो
भारत की विदेश नीति अब स्पष्ट संकेत दे रही है कि जो देश भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करेगा, उसे राजनयिक दूरी का सामना करना पड़ेगा. विशेषज्ञों का कहना है कि तुर्की के साथ यह कदम केवल एक प्रतीकात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि भारत की “नए युग की डिप्लोमेसी” का हिस्सा है, जहां जवाब बयानों से नहीं, कदमों से दिया जाता है.
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