Trump Kim Meet: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं, लेकिन इस बार वजह कुछ अलग है. हमेशा "डील मेकर" की छवि में नजर आने वाले ट्रंप अब बिना किसी शर्त उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन से मिलने को तैयार हैं. यह वही ट्रंप हैं जिन्होंने हमेशा कहा कि जब तक उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम पर लगाम नहीं लगाता, तब तक बातचीत मुमकिन नहीं. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है.
दक्षिण कोरिया की समाचार एजेंसी योन्हाप और अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप और किम जोंग उन की यह संभावित चौथी मुलाकात 31 अक्टूबर से 1 नवंबर के बीच दक्षिण कोरिया में आयोजित APEC सम्मेलन के इतर हो सकती है. व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार, इस बार बातचीत में कोई भी "प्री-कंडीशन" शामिल नहीं होगी, न परमाणु हथियारों पर रोक की मांग, न ही किसी समझौते की शर्तें.
ट्रंप का रुख क्यों बदला?
यह पहली बार है जब ट्रंप प्रशासन ने खुलकर कहा है कि उत्तर कोरिया से "बिना शर्त सीधी बातचीत" के लिए अमेरिका तैयार है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह कदम न सिर्फ एक स्ट्रेटजिक डिप्लोमेटिक शिफ्ट है, बल्कि 2026 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले उनकी इमेज बिल्डिंग की भी कोशिश हो सकती है.
ट्रंप इससे पहले किम जोंग उन से तीन बार मिल चुके हैं, 2018 में सिंगापुर, 2019 में वियतनाम और बाद में डिमिलिट्राइज्ड ज़ोन (DMZ) में ऐतिहासिक मुलाकात हुई थी.
किम का नरम रुख भी संकेत दे रहा है
उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन ने हाल ही में अपनी संसद में कहा कि "उन्हें ट्रंप से मुलाकात की यादें अच्छी हैं." यह बयान भी बताता है कि उत्तर कोरिया इस संभावित बातचीत को लेकर सकारात्मक संकेत भेज रहा है.
हालांकि, पिछले ही महीने किम ने यह भी दोहराया था कि परमाणु कार्यक्रम कभी नहीं छोड़ा जाएगा. ऐसे में बातचीत की मेज़ पर पहुंचने तक क्या रुख रहेगा, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी.
कूटनीति या चुनावी रणनीति?
ट्रंप का यह यू-टर्न सिर्फ शांति की पहल नहीं हो सकती. विश्लेषकों का मानना है कि इससे ट्रंप दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि वे मुश्किल से मुश्किल नेताओं से सीधे संवाद कर सकते हैं, चाहे वह किम हों या पुतिन. दूसरी तरफ, किम जोंग उन भी पश्चिमी प्रतिबंधों से राहत और वैश्विक मान्यता चाहते हैं, और ट्रंप के साथ बातचीत उन्हें यह मंच दे सकती है.
क्या निकल सकता है नतीजा?
बातचीत के संकेत भले ही सकारात्मक हों, लेकिन नतीजे की भविष्यवाणी करना मुश्किल है. ट्रंप की "बिना शर्त बातचीत" की पेशकश, जहां एक तरफ राजनयिक दरवाज़े खोल सकती है, वहीं यह भी सवाल खड़ा करती है कि क्या अमेरिका अपने पुराने सिद्धांतों से पीछे हट रहा है? अगर यह बैठक होती है, तो यह न सिर्फ अमेरिका-उत्तर कोरिया संबंधों में, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा राजनीति में एक नया अध्याय हो सकता है.
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