टोक्यो: अमेरिका ने एक महत्वपूर्ण सैन्य कदम उठाते हुए जापान में पहली बार अपने टायफून मिसाइल सिस्टम की सार्वजनिक रूप से तैनाती और प्रदर्शन किया है. यह कदम न केवल अमेरिका-जापान के सैन्य सहयोग को और गहरा करता है, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक संतुलन को भी नई दिशा देने वाला माना जा रहा है. अमेरिका की इस रणनीतिक पहल से चीन और रूस दोनों ही नाराज हैं और उन्होंने इस कदम को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है.
टायफून मिसाइल सिस्टम क्यों है खास?
टायफून मिसाइल सिस्टम को अमेरिकी सेना की मरीन कोर द्वारा ऑपरेट किया जाता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मल्टीपल वेपन्स लॉन्चिंग प्लेटफॉर्म है. यह एक साथ टॉमहॉक क्रूज मिसाइल (लगभग 1600 किलोमीटर की रेंज) और SM-6 इंटरसेप्टर मिसाइल को लॉन्च कर सकता है.
इस प्रणाली का एक और बड़ा लाभ इसकी तेज़ गति से तैनाती करने की क्षमता है. यानी अगर आवश्यकता पड़ी तो अमेरिका कुछ ही घंटों के भीतर इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण किसी भी स्थान पर भेज सकता है. इसका मतलब यह है कि अमेरिका अब किसी भी तनावपूर्ण स्थिति में जल्दी से जवाब देने की स्थिति में है.
रेजोल्यूट ड्रैगन 2025: शक्ति का प्रदर्शन
यह तैनाती "Resolute Dragon 2025" नामक एक बड़े सैन्य अभ्यास के दौरान की गई है, जिसमें 20,000 से अधिक जापानी और अमेरिकी सैनिकों ने भाग लिया. इस अभ्यास का मकसद दोनों देशों के बीच आपसी तालमेल और रणनीतिक तैयारी को मजबूत करना है.
BREAKING
— Aadil Brar (@aadilbrar) September 15, 2025
1/ The U.S. Army’s Typhon Missile System has been deployed to Japan for the first time.
Unveiled at Iwakuni base, Typhon can launch Tomahawk cruise missiles (range ~1,600 km) — enough to strike across the East China Sea and into parts of China.
This marks a major… pic.twitter.com/wUFMt7jJqx
इस ड्रिल में टायफून मिसाइल सिस्टम की सक्रिय तैनाती और प्रदर्शन ने साफ कर दिया कि अमेरिका अब सिर्फ रणनीतिक साझेदारी तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह एशिया में अपनी सैन्य उपस्थिति को और मजबूत करने की दिशा में बढ़ रहा है.
चीन और रूस क्यों हैं चिंतित?
टायफून मिसाइल की 1600 किलोमीटर तक की मारक क्षमता के चलते यह चीन के पूर्वी तटों और रूस के कुछ हिस्सों को सीधे निशाना बना सकता है. यही कारण है कि बीजिंग और मॉस्को दोनों ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है. चीन ने इसे "उत्तेजक" बताते हुए कहा कि यह पूरे क्षेत्र की स्थिरता और शांति के लिए खतरा है, जबकि रूस ने भी इसे हथियारों की होड़ को और भड़काने वाला कदम बताया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका पहले चीन को नाराज करने वाले कदमों से बचता था, लेकिन अब रणनीतिक समीकरण बदल चुके हैं. अमेरिका और जापान अब आक्रामक सैन्य तैयारियों को सार्वजनिक रूप से दिखा रहे हैं और चीन को यह स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि किसी भी आक्रामकता का अब खुलकर जवाब दिया जाएगा.
क्या है "फर्स्ट आइलैंड चेन" रणनीति?
अमेरिका की यह तैनाती उसके First Island Chain Strategy का हिस्सा है. इस रणनीति के तहत अमेरिका जापान, फिलीपींस, गुआम और अन्य प्रशांत द्वीपों में ऐसे सैन्य ठिकाने बना रहा है, जिससे चीन की नौसैनिक और वायु शक्ति को सीमित किया जा सके.
यह रणनीति चीन को अपने मुख्य भूभाग से आगे बढ़ने से रोकने के लिए बनाई गई है, जिससे उसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सैन्य विस्तार करने में कठिनाई हो. टायफून सिस्टम की जापान में तैनाती इसी रणनीति को और मजबूत करती है.
INF संधि खत्म होने के बाद अमेरिकी रणनीति
टायफून जैसी प्रणाली की तैनाती पहले संभव नहीं थी क्योंकि अमेरिका INF Treaty (Intermediate-Range Nuclear Forces Treaty) के तहत जमीन से दागी जाने वाली मध्यम दूरी की मिसाइलें नहीं रख सकता था. लेकिन 2019 में इस संधि के टूटने के बाद, अमेरिका को अब इस प्रकार की मिसाइलों को तैनात करने की पूरी स्वतंत्रता मिल गई है.
अब अमेरिका फास्ट प्रोडक्शन और फॉरवर्ड डिप्लॉयमेंट पर ध्यान दे रहा है ताकि चीन की तेजी से बढ़ती मिसाइल शक्ति को संतुलित किया जा सके.
अमेरिका के कमांडर का बयान
टायफून सिस्टम के प्रदर्शन के दौरान, अमेरिका की टास्क फोर्स के कमांडर कर्नल वेड जर्मन ने कहा कि यह प्रणाली न केवल एक उच्च मारक क्षमता रखती है, बल्कि इसका लचीलापन और त्वरित तैनाती क्षमता इसे खास बनाती है.
उन्होंने कहा, "कई प्रणालियों और विभिन्न प्रकार के हथियारों का उपयोग करके, यह दुश्मन के लिए दुविधाएं पैदा करने में सक्षम है... इसकी त्वरित तैनाती हमें रणनीतिक बढ़त देती है."
हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि अभ्यास के बाद टायफून यूनिट कहां जाएगी या क्या भविष्य में यह फिर से जापान लौटेगी.
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