पश्चिम बंगाल के मदरसों में 'वंदे मातरम' अनिवार्य, शुभेंदु अधिकारी का बड़ा फैसला, जानें नया नियम

पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के मदरसों को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है. सरकारी स्कूलों के बाद अब राज्य के सभी सरकारी और सरकारी मान्यता प्राप्त मदरसों में भी ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य कर दिया गया है.

Vande Mataram is mandatory in Madrassas of West Bengal Shubhendu Adhikari
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पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के मदरसों को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है. सरकारी स्कूलों के बाद अब राज्य के सभी सरकारी और सरकारी मान्यता प्राप्त मदरसों में भी ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य कर दिया गया है. सुवेंदु अधिकारी सरकार के इस फैसले को शिक्षा व्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है.

राज्य के अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग की ओर से जारी इस निर्देश के बाद बंगाल की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है. एक तरफ इसे राष्ट्रभावना को मजबूत करने वाला कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल और कुछ सामाजिक संगठन इस फैसले पर सवाल भी उठा रहे हैं.

सरकार के आदेश में क्या कहा गया?

19 मई को मदरसा शिक्षा निदेशालय की ओर से एक आधिकारिक आदेश जारी किया गया. आदेश के मुताबिक राज्य के सभी सरकारी मॉडल मदरसों, सहायता प्राप्त (एडेड) और गैर-सहायता प्राप्त (अनएडेड) मान्यता प्राप्त मदरसों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान ‘वंदे मातरम’ गाना अनिवार्य होगा.

निर्देश में साफ कहा गया है कि पहले जारी किए गए सभी पुराने आदेश और प्रथाएं अब प्रभावहीन मानी जाएंगी और नई व्यवस्था तुरंत लागू होगी.

सरकारी सूत्रों के अनुसार, सभी संस्थानों को इस आदेश का पालन करना होगा और बाद में विभाग को इसकी अनुपालन रिपोर्ट भी भेजनी होगी. इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि सरकार इस फैसले को लेकर गंभीर रुख अपनाए हुए है.

मदरसों की सुबह की प्रार्थना में होगा बदलाव

अब तक पश्चिम बंगाल के अधिकांश मदरसों में सुबह की सभा के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ गाया जाता था. इसके अलावा कई मदरसों में पारंपरिक तौर पर कवि गुलाम मुस्तफा की लिखी प्रार्थना ‘अनंत असीम प्रेममय तुमि’ भी गाई जाती थी.

नए आदेश के बाद अब ‘वंदे मातरम’ को सुबह की प्रार्थना का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाएगा. माना जा रहा है कि इससे मदरसों की दैनिक गतिविधियों और प्रार्थना सभाओं का स्वरूप कुछ हद तक बदल जाएगा.

राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान पर जोर

सरकार के करीबी सूत्रों का कहना है कि यह फैसला छात्रों को देश की सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जोड़ने के उद्देश्य से लिया गया है.

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशभक्ति का प्रमुख प्रतीक माना जाता रहा है. आजादी की लड़ाई में यह गीत आंदोलनकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना था.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इस कदम के जरिए राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकता का संदेश देने की कोशिश कर रही है.

विश्व हिंदू परिषद ने किया स्वागत

विश्व हिंदू परिषद ने पश्चिम बंगाल सरकार के इस फैसले का खुलकर समर्थन किया है. संगठन के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने एक वीडियो संदेश जारी कर इसे ऐतिहासिक कदम बताया.

उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम’ ने देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने में बड़ी भूमिका निभाई थी, लेकिन लंबे समय तक इसे वह स्थान नहीं मिल पाया जिसका वह हकदार था.

विनोद बंसल ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार का यह फैसला राष्ट्रगीत को सम्मान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और इससे नई पीढ़ी देश के स्वतंत्रता संग्राम की भावना से और करीब जुड़ेगी.

राजनीतिक गलियारों में तेज हुई चर्चा

सरकार के इस फैसले के बाद राज्य में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है. समर्थक दल इसे राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाला निर्णय बता रहे हैं, जबकि विरोधी पक्ष इसे संवेदनशील मुद्दा मानते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहा है.

हालांकि राज्य सरकार की ओर से अभी तक यह साफ किया गया है कि यह फैसला शिक्षा संस्थानों में राष्ट्रभावना को बढ़ावा देने और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करने के उद्देश्य से लिया गया है.

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