इस्लामाबाद: अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है. इस्तांबुल में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच हुई शांति वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई. इस वार्ता का उद्देश्य सीमा पर जारी हिंसक झड़पों को रोकना था, लेकिन बातचीत विफल होने के बाद हालात और बिगड़ते दिख रहे हैं. अब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं, जिससे डूरंड रेखा पर संघर्ष के आसार बढ़ गए हैं.
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि अगर दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति बनती है, तो पाकिस्तान के सामने कई गंभीर चुनौतियाँ खड़ी होंगी. हालाँकि पाकिस्तानी सेना की ताकत तालिबान से कहीं अधिक है, लेकिन भौगोलिक, धार्मिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ पाकिस्तान के लिए इस संघर्ष को बेहद जटिल बना सकती हैं.
सैन्य शक्ति के बावजूद मुश्किल में पाकिस्तान
अफगान मामलों के विशेषज्ञ अहमदुल्लाह अर्चीवाल के अनुसार, सैन्य दृष्टि से पाकिस्तान के पास आधुनिक हथियार, हवाई ताकत और प्रशिक्षित सैनिक हैं, जबकि तालिबान की सेना असंगठित और अपेक्षाकृत कमजोर है. पहली नज़र में यह संघर्ष पाकिस्तान के पक्ष में झुका हुआ लगता है. लेकिन लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में तालिबान के पास भूगोल, गुरिल्ला रणनीति और स्थानीय समर्थन जैसी कई बढ़तें हैं.
तालिबान अफगानिस्तान की दुर्गम पहाड़ियों और सीमावर्ती इलाकों में अच्छी तरह से जमी हुई ताकत है. अतीत में उसने अमेरिका और नाटो सेनाओं जैसी महाशक्तियों को भी चुनौती दी थी. ऐसे में पाकिस्तान के लिए यह युद्ध लंबा, महंगा और राजनीतिक रूप से अस्थिर करने वाला साबित हो सकता है.
धार्मिक वैधता की चुनौती
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी दुविधा अपने युद्ध को “धार्मिक और वैचारिक वैधता” देना होगी. अतीत में पाकिस्तान ने अफगान मुजाहिदीन और कश्मीर में छद्म युद्धों को धार्मिक रंग देकर समर्थन जुटाया था. लेकिन अब तालिबान खुद इस्लामिक शासन का दावा करता है, और कई सुन्नी धार्मिक संगठनों में उसका प्रभाव बढ़ा है.
तालिबान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी का भारत स्थित देवबंद मदरसे का दौरा इसी प्रभाव का उदाहरण माना जा रहा है. देवबंद दक्षिण एशिया में सुन्नी इस्लामी विचारधारा का बड़ा केंद्र है. मुत्तकी की यात्रा के बाद तालिबान ने खुद को “सच्चे इस्लामी शासन का प्रतिनिधि” बताना शुरू कर दिया है.
ऐसे में पाकिस्तानी धार्मिक विद्वानों के लिए तालिबान के खिलाफ युद्ध को धार्मिक आधार पर सही ठहराना लगभग असंभव हो जाएगा. इससे पाकिस्तान को आंतरिक धार्मिक असहमति का सामना करना पड़ सकता है.
राजनीतिक दलों में मतभेद
तालिबान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर पाकिस्तानी राजनीति बंटी हुई है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार और सेना का रुख आक्रामक है, जबकि कई प्रमुख राजनीतिक दल इसका विरोध कर रहे हैं.
इमरान खान की पीटीआई, अवामी नेशनल पार्टी (ANP) और पख्तूनख्वां मिल्ली अवामी पार्टी (PkMAP) जैसे दल खुले तौर पर युद्ध के खिलाफ हैं. विशेष रूप से खैबर पख्तूनख्वां (Khyber Pakhtunkhwa) प्रांत में, जहां पीटीआई की सरकार है, वहां के स्थानीय नेता और जनता सेना के अभियानों का विरोध कर रहे हैं.
यह विरोध केवल राजनीतिक नहीं बल्कि जातीय और आर्थिक हितों से भी जुड़ा है, क्योंकि इस प्रांत की बड़ी आबादी पश्तून समुदाय से आती है, जिनके सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध अफगानिस्तान के तालिबान-प्रभावित इलाकों से हैं.
घरेलू समर्थन की कमी
पाकिस्तान की जनता का एक बड़ा हिस्सा तालिबान के खिलाफ सीधे युद्ध के पक्ष में नहीं है. सीमा से लगे इलाकों में रहने वाले पश्तून समुदायों का झुकाव अक्सर तालिबान के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रहा है.
अफगानिस्तान पर किए गए हवाई हमलों के बाद भी पाकिस्तान को अपेक्षित घरेलू समर्थन नहीं मिला. केपी और बलूचिस्तान जैसे सीमावर्ती प्रांतों की अर्थव्यवस्था अफगानिस्तान के साथ व्यापार पर निर्भर है. युद्ध की स्थिति में इन इलाकों में व्यापार ठप हो सकता है, जिससे जनता में असंतोष और बढ़ेगा.
आर्थिक संकट में घिरा पाकिस्तान
पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है. विदेशी कर्ज, महंगाई और गिरते विदेशी निवेश ने उसकी आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया है.
ऐसे में एक नया युद्ध उसकी अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर देगा.
रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक हालत उसे लंबे समय तक चलने वाला युद्ध झेलने की अनुमति नहीं देती. सेना के पास संसाधन हैं, लेकिन वित्तीय संकट और राजनीतिक अस्थिरता के चलते युद्ध की लागत बहुत भारी पड़ेगी.
अंतरराष्ट्रीय स्थिति और पाकिस्तान की गणना
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर हालिया हवाई हमलों से पहले यह उम्मीद की थी कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर अमेरिका और चीन, उसके पक्ष में खड़ा होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
अमेरिका, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र जैसे प्रमुख संगठनों ने किसी पक्ष का समर्थन करने की बजाय संयम और युद्धविराम की अपील की है. इससे पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति कमजोर हुई है.
भूगोल भी पाकिस्तान के खिलाफ
अफगानिस्तान का भौगोलिक ढांचा- ऊँचे पहाड़, सीमित सड़क नेटवर्क और कठिन मौसम हमेशा से किसी भी बाहरी सेना के लिए चुनौती रहा है. अमेरिका और सोवियत संघ दोनों इस क्षेत्र में लंबे संघर्षों के बाद असफल हुए थे.
तालिबान की गुरिल्ला रणनीति और स्थानीय जनसमर्थन पाकिस्तान के लिए भी वही चुनौती बन सकते हैं. किसी निर्णायक जमीनी जीत की संभावना बेहद कम है, जबकि हवाई हमले नागरिक क्षति बढ़ाकर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
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