Falta By Election: पश्चिम बंगाल की राजनीति में दक्षिण 24 परगना जिले की फलता विधानसभा सीट इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में बनी हुई है. कभी तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर अब राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदलती नजर आ रही है. 2026 विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद पहली बार ऐसा माहौल बना है, जब फलता सीट पर टीएमसी बैकफुट पर दिखाई दे रही है.
गुरुवार को इस सीट पर पुनर्मतदान यानी री-पोलिंग हो रही है. मतदान सुबह 7 बजे से शुरू होकर शाम 6 बजे तक चलेगा, जबकि मतगणना 24 मई को की जाएगी. चुनाव आयोग ने 29 अप्रैल को मतदान के दौरान कथित धांधली और अनियमितताओं के आरोपों के बाद यहां का चुनाव रद्द कर दोबारा मतदान कराने का फैसला लिया था.
इस बार चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है. भाजपा ने देबांग्शु पांडा को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस की ओर से अब्दुर रज्जाक मोल्ला चुनाव लड़ रहे हैं. इसके अलावा माकपा के शंभुनाथ कुर्मी, निर्दलीय उम्मीदवार दीप हाटी और चंद्रकांत राय भी मैदान में मौजूद हैं. हालांकि सबसे बड़ी चर्चा टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान के चुनाव मैदान से हटने को लेकर हो रही है, जिसने पूरे चुनावी समीकरण को बदल दिया है.
टीएमसी के गढ़ में बदली राजनीतिक हवा
फलता विधानसभा सीट पिछले डेढ़ दशक से तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव वाले इलाकों में गिनी जाती रही है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शासनकाल में दक्षिण 24 परगना जिले में टीएमसी की पकड़ काफी मजबूत रही थी. खासतौर पर डायमंड हार्बर क्षेत्र को पार्टी का राजनीतिक मॉडल माना जाता था, जिसकी जिम्मेदारी सांसद अभिषेक बनर्जी के हाथों में रही है.
लेकिन 2026 विधानसभा चुनाव के बाद हालात तेजी से बदलते नजर आए. राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद टीएमसी लगातार दबाव में दिखाई दी और अब फलता सीट पर पार्टी उम्मीदवार का चुनाव से हटना संगठन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस सीट को कभी टीएमसी का सुरक्षित गढ़ समझा जाता था, वहां अब पार्टी का प्रभाव कमजोर पड़ता दिख रहा है.
जहांगीर खान के हटने से बढ़ी बीजेपी की उम्मीदें
मंगलवार को टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनाव मैदान से हटने का ऐलान कर दिया. उनके इस फैसले ने चुनावी मुकाबले को पूरी तरह बदल दिया. राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है.
जहांगीर खान ने कहा कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा फलता क्षेत्र के लिए घोषित विशेष विकास पैकेज को देखते हुए उन्होंने चुनाव से हटने का फैसला लिया है. उनका कहना था कि इलाके के विकास को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने यह कदम उठाया.
हालांकि राजनीतिक जानकार इसे केवल विकास का मुद्दा नहीं मान रहे हैं. माना जा रहा है कि पार्टी के भीतर बढ़ती दूरी और नेतृत्व स्तर पर संवाद की कमी भी इस फैसले की बड़ी वजह रही. जहांगीर के हटने को अभिषेक बनर्जी के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है.
अभिषेक बनर्जी के ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ पर सवाल
टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी लंबे समय से दक्षिण 24 परगना और डायमंड हार्बर क्षेत्र में अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ के लिए जाने जाते रहे हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की थी. 2021 के विधानसभा चुनाव में भी इस इलाके में पार्टी को अच्छी बढ़त मिली थी.
लेकिन दो साल के भीतर हालात पूरी तरह बदल गए. फलता सीट पर जहांगीर खान जैसे करीबी नेता का चुनाव से हटना यह संकेत दे रहा है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना टीएमसी संगठन के कमजोर होते ढांचे और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को भी उजागर करती है.
बताया जा रहा है कि जहांगीर खान ने चुनाव से हटने के फैसले से पहले अभिषेक बनर्जी से संपर्क करने की कोशिश की थी, लेकिन बातचीत नहीं हो सकी. इसके बाद उन्होंने खुद ही चुनाव मैदान छोड़ने की घोषणा कर दी.
बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला
टीएमसी उम्मीदवार के हटने के बाद अब फलता सीट पर मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटता नजर आ रहा है. भाजपा इस सीट को प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर पूरी ताकत झोंक रही है. अगर भाजपा यहां जीत दर्ज करती है, तो विधानसभा में उसकी सीटों की संख्या और मजबूत हो सकती है.
दूसरी ओर कांग्रेस भी इस मौके को अपने लिए बड़ा राजनीतिक अवसर मान रही है. पार्टी उम्मीदवार अब्दुर रज्जाक मोल्ला लगातार स्थानीय मुद्दों को लेकर प्रचार कर रहे हैं. कांग्रेस का दावा है कि टीएमसी के कमजोर पड़ने का लाभ उन्हें मिलेगा.
वाम दल भी इस सीट पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मुख्य लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के बीच ही मानी जा रही है.
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