11 नवंबर की रात अभिनेता गोविंदा की तबीयत अचानक बिगड़ने की खबर ने उनके चाहने वालों को चिंता में डाल दिया. करीब रात 8 बजे उन्हें तेज चक्कर आने लगे और आधी रात के आसपास वह अचानक बेहोश होकर गिर पड़े. परिवार ने डॉक्टर से फोन पर सलाह लेकर दवाएं दीं, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ. जांच में पता चला कि वह ‘डिसऑरिएंटेशन’ यानी दिशाभ्रम की स्थिति से गुजर रहे थे. हालांकि, अब उनकी तबीयत स्थिर है, लेकिन यह घटना इस समस्या की गंभीरता पर ध्यान खींचती है.
डिसऑरिएंटेशन केवल सामान्य भूलने का मामला नहीं है, बल्कि एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति अचानक यह समझ पाना बंद कर देता है कि वह कहां है, कौन है या कौन-सा दिन चल रहा है. कई बार यह स्थिति तुरंत प्रकट होती है और कई बार धीरे-धीरे विकसित होती है. इस अवस्था में व्यक्ति का दिमाग वास्तविकता से अस्थायी रूप से अलग होने लगता है. इससे सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ता है और व्यक्ति अपने आसपास के माहौल को समझ नहीं पाता. कई मामलों में भय, बेचैनी, गुस्सा या अव्यवस्थित व्यवहार जैसे लक्षण भी देखने को मिलते हैं.
कैसे पहचानें डिसऑरिएंटेशन?
डिसऑरिएंटेशन होने पर व्यक्ति के व्यवहार में कई तरह के बदलाव आ जाते हैं. उसकी सोच गड़बड़ा सकती है, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत होती है और सोच में भ्रम पैदा होने लगता है.कई बार ऐसे लोग ऐसी चीजें देखते या सुनते हैं जो वास्तविकता में मौजूद ही नहीं होतीं. इससे उनकी घबराहट और बढ़ जाती है.
किन कारणों से होता है दिशाभ्रम?
डिसऑरिएंटेशन आमतौर पर किसी शारीरिक या मानसिक समस्या का लक्षण होता है. इसके दो प्रमुख कारण माने जाते हैं—डेलीरियम और डिमेंशिया.
डेलीरियम क्या है?
डेलीरियम दिमाग की कार्यप्रणाली अचानक प्रभावित होने पर होता है. यह कुछ घंटों या कुछ दिनों तक रह सकता है.इसके पीछे दवाओं के दुष्प्रभाव, संक्रमण, सिर की चोट, सर्जरी के बाद माहौल में बदलाव जैसी वजहें हो सकती हैं.कुछ बुजुर्ग लोग अस्पताल में भर्ती होने के बाद ‘हॉस्पिटल डेलीरियम’ का भी अनुभव करते हैं.
डिमेंशिया की भूमिका
डिमेंशिया धीरे-धीरे बढ़ने वाली और अक्सर स्थायी स्थिति होती है. इसमें व्यक्ति की याददाश्त कमजोर होती जाती है और दिशा पहचानने की क्षमता पर भी असर पड़ता है.अल्जाइमर डिजीज इसका सबसे आम कारण है.
क्या करें जब कोई व्यक्ति हो जाए डिसऑरिएंटेड?
अगर किसी व्यक्ति में दिशाभ्रम के लक्षण दिखते हैं, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.डॉक्टर को मरीज का मेडिकल इतिहास, दवाओं की जानकारी और हाल की किसी चोट या तनाव की जानकारी देना सही निदान में मदद करता है.मरीज को शांत, सुरक्षित और परिचित माहौल में रखना बेहद जरूरी होता है. परिवार के परिचित चेहरे, पसंदीदा वस्तुएं और भरोसे का एहसास उसे स्थिर रखने में मदद करते हैं.
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