अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ दुनिया भर में गुस्से की लहर दौड़ गई है. वॉशिंगटन डीसी से लेकर लंदन और मैड्रिड तक, हजारों लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद की. विरोध का यह सिलसिला एक अंतरराष्ट्रीय अभियान का हिस्सा है, जिसे 'No Kings' यानी ‘राजा नहीं चाहिए’ नाम दिया गया है. आयोजकों का कहना है कि यह प्रदर्शन लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और तानाशाही प्रवृत्तियों के खिलाफ एक शांतिपूर्ण जनजागरण है.
इस व्यापक विरोध अभियान में अमेरिका के अलावा यूरोप के कई देशों में प्रदर्शन आयोजित किए गए. लंदन में अमेरिकी दूतावास के बाहर बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए. वहीं, स्पेन के मैड्रिड और बार्सिलोना में भी जनसभाएं हुईं. अमेरिका के विभिन्न राज्यों — चाहे वो बड़े शहर हों या छोटे कस्बे — में भी हजारों की भीड़ सड़कों पर उतरी.
क्या है विरोध की वजह?
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप की माइग्रेशन नीति, शिक्षा क्षेत्र में कटौतियां और सुरक्षा के नाम पर लिए गए कठोर फैसले संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं. उन्होंने न केवल फिलिस्तीन समर्थकों पर नज़र रखी, बल्कि विवि परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी सीमित करने के प्रयास किए. वहीं, नेशनल गार्ड की कई राज्यों में तैनाती ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया है.
वॉशिंगटन की सड़कों पर दिखा गुस्सा
राजधानी वॉशिंगटन डीसी में प्रदर्शनकारियों ने रंग-बिरंगी पोशाकें पहनकर और हाथों में पोस्टर लेकर मार्च निकाला. पेंसिल्वेनिया एवेन्यू पर हुए इस मार्च में नागरिकों ने शांति और लोकतंत्र की पुकार लगाई. इस विरोध को अंजाम देने के लिए 300 से अधिक स्थानीय संगठनों ने एक साथ मिलकर काम किया.
‘हम राजा नहीं मानते’: प्रदर्शनकारियों का साफ संदेश
इस आंदोलन को शुरू करने वाले संगठन इंडिविज़िबल की सह-संस्थापक लीह ग्रीनबर्ग ने स्पष्ट किया कि अमेरिका किसी राजा का देश नहीं है, बल्कि यहां जनता सर्वोपरि है. उन्होंने इसे किसी राजनीतिक दल का विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के रूप में परिभाषित किया.
ट्रंप की प्रतिक्रिया: 'मैं राजा नहीं हूं'
विरोध प्रदर्शनों पर ट्रंप ने ज्यादा टिप्पणी नहीं की, लेकिन फॉक्स बिजनेस को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “लोग मुझे राजा कह रहे हैं, लेकिन मैं कोई राजा नहीं हूं.” उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ.
प्रदर्शनों को मिला सामाजिक संगठनों का सहयोग
इस आंदोलन को सफल बनाने में अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन (ACLU) सहित कई संगठनों का अहम योगदान रहा. ACLU ने हज़ारों वॉलंटियर्स को कानूनी प्रशिक्षण और भीड़ नियंत्रण के लिए तैयार किया, ताकि वे प्रदर्शन में मदद कर सकें. सोशल मीडिया पर प्रचार-प्रसार ने भी इस आंदोलन को व्यापक आकार देने में बड़ी भूमिका निभाई.
अर्लिंग्टन सेमेट्री से लेकर वर्जीनिया तक विरोध की लहर
वॉशिंगटन से सटे उत्तरी वर्जीनिया में भी बड़े पैमाने पर रैलियां आयोजित की गईं. कई प्रदर्शनकारी राजधानी की ओर जाने वाले पुलों पर मार्च करते नजर आए. वहीं, अर्लिंग्टन नेशनल सेमेट्री के पास जुटी भीड़ ने ट्रंप द्वारा प्रस्तावित स्मारक द्वार योजना का विरोध किया.
राजनीतिक समर्थन और विरोध दोनों मुखर
इस आंदोलन को प्रगतिशील नेताओं का समर्थन भी मिला. सीनेटर बर्नी सैंडर्स, सांसद एलेक्ज़ेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज़ और हिलेरी क्लिंटन ने इस पहल की सराहना की. दूसरी ओर, रिपब्लिकन नेताओं ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी. हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने इन रैलियों को ‘देशविरोधी’ बताया और कहा कि इससे देश की एकता को नुकसान पहुंच सकता है. कुछ नेताओं ने सितंबर में ट्रंप समर्थक चार्ली कर्क की हत्या का हवाला देते हुए ऐसे आंदोलनों को संभावित हिंसा का कारण भी बताया.
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