Trinidad-Tobago: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पांच देशों की यात्रा के तहत इस समय कैरिबियाई देश त्रिनिदाद और टोबैगो में हैं. यहां उनकी आगवानी प्रधानमंत्री कमला प्रसाद बिसेसर ने बड़े सम्मान और गर्मजोशी से की. इस यात्रा ने न सिर्फ दोनों देशों के बीच रिश्तों को नई दिशा दी है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े इन दो संस्कृतियों की साझा विरासत को फिर से उजागर कर दिया है.
त्रिनिदाद और टोबैगो का इतिहास
त्रिनिदाद और टोबैगो की धरती एक समय पर आदिवासी समुदायों का घर हुआ करती थी. लेकिन 16वीं सदी में क्रिस्टोफर कोलंबस के आगमन के बाद यह क्षेत्र स्पेन के उपनिवेश के रूप में दर्ज हुआ. वर्ष 1797 में ब्रिटेन ने इसे अपने अधीन ले लिया और बाद में 1889 में टोबैगो को त्रिनिदाद में मिला दिया गया. अंततः वर्ष 1962 में यह द्वीपीय देश ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ.
बक्सर की बेटी, कैरिबियन की नेता
त्रिनिदाद की प्रधानमंत्री कमला प्रसाद बिसेसर का भारत, विशेष रूप से बिहार से गहरा रिश्ता है. उनके पूर्वज बक्सर जिले के भेलूपुर गांव से हैं. जब वह प्रधानमंत्री बनीं, तब बिहार में उनके गांव में उत्सव जैसा माहौल था. यह भारत और खासकर बिहार के लिए गौरव की बात रही कि विदेश में एक भारतीय मूल की महिला इतना ऊंचा ओहदा हासिल कर पाई.
गिरमिटिया मजदूर: संघर्ष की विरासत
भारत और त्रिनिदाद का जुड़ाव महज़ राजनयिक नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें 1845 में पहुंचती हैं, जब 'फातेल रज़ाक' नामक जहाज से 225 भारतीय मजदूर त्रिनिदाद लाए गए थे. इनमें से अधिकतर उत्तर प्रदेश और बिहार से थे. इन्हें 5 से 7 वर्षों के अनुबंध पर काम के लिए ले जाया गया था. इस अनुबंध को उस समय 'एग्रीमेंट' कहा जाता था, जिसे बोलचाल में 'गिरमिट' कहा जाने लगा. यही से ‘गिरमिटिया’ शब्द प्रचलन में आया.
संस्कृति और पहचान का संगम
आज त्रिनिदाद और टोबैगो की करीब 40% आबादी भारतीय मूल की है. यानी लगभग 5 लाख से अधिक लोग ऐसे हैं, जिनकी जड़ें भारत से जुड़ी हैं. वे न केवल अपनी भाषा, भोजन और परंपराएं संजोए हुए हैं, बल्कि राजनीति, शिक्षा, व्यापार और प्रशासन में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. कमला प्रसाद बिसेसर और देश की राष्ट्रपति दोनों ही गिरमिटिया मजदूरों की वंशज हैं.
भारत और त्रिनिदाद के रिश्ते
भारत ने त्रिनिदाद और टोबैगो की आजादी के तुरंत बाद राजनयिक संबंध स्थापित किए थे. लेकिन दोनों देशों के रिश्ते सिर्फ राजनीतिक नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक, भावनात्मक और ऐतिहासिक भी हैं. प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा न केवल रणनीतिक संबंधों को मजबूत करेगी, बल्कि गिरमिटिया विरासत को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान भी देगी.
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