हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए चार दिवसीय सैन्य संघर्ष के बाद अमेरिका की एक अप्रत्याशित पहल सबके ध्यान का केंद्र बन गई—पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर को वाशिंगटन बुलाकर व्हाइट हाउस में विशेष लंच दिया गया. जिस देश को कभी आतंकवाद के वित्तपोषण के लिए FATF की ग्रे लिस्ट में डाला गया था, अब वही पाकिस्तान अमेरिका के लिए ‘महत्वपूर्ण साझेदार’ बनता जा रहा है. आखिर ऐसा क्या बदल गया है?
इस संबंध में अमेरिका के एक पूर्व CIA अधिकारी जॉन किरियाकौ ने ऐसा खुलासा किया है जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सामरिक संतुलन की परतों को झकझोर कर रख देता है.
व्हाइट हाउस में आसिम मुनीर का स्वागत—आखिर क्यों?
आर्मी चीफ मुनीर को अमेरिका द्वारा दिए गए इस सम्मान के पीछे केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि गहरे रणनीतिक स्वार्थ छिपे थे. दो प्रमुख कारण पहले ही सामने आ चुके हैं. ईरान पर संभावित हमले की तैयारी: अमेरिका, पाकिस्तान के एयरस्पेस और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के लिए तैयार रखना चाहता है. ट्रंप फैमिली की क्रिप्टो डील: खबर है कि आसिम मुनीर ने ट्रंप के दामाद की क्रिप्टो कंपनी की डील पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से बंद कमरे में कराई थी. इसके एवज में ट्रंप परिवार ने पाकिस्तान में ‘क्रिप्टो काउंसिल’ तक बनवा दी. लेकिन अब एक तीसरा और भी चौंकाने वाला कारण सामने आया है, जो अमेरिका और पाकिस्तान की निकटता को बिल्कुल नई रोशनी में रखता है.
पाक के परमाणु हथियार अमेरिका के नियंत्रण में?
पूर्व CIA अधिकारी जॉन किरियाकौ का दावा है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की कमान और नियंत्रण एक अमेरिकी जनरल के अधीन है. यह खुलासा न केवल पाकिस्तान की संप्रभुता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अमेरिका, पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को किस हद तक नियंत्रित करता है.
यह खुलासा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अमेरिका की बेचैनी की वजह भी साफ करता है—अगर भारत ने पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों को टारगेट किया होता, तो नुकसान अमेरिका की ‘सीधी निगरानी’ में आने वाले शस्त्रों को भी हो सकता था. यही वजह रही कि अमेरिका युद्धविराम को लेकर सबसे ज्यादा सक्रिय और बेचैन नजर आया.
भारत के ऑपरेशन सिंदूर से अमेरिका को क्यों था डर?
जब भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पीओके में आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाकर ऑपरेशन सिंदूर चलाया, तो सबसे अधिक बेचैनी वाशिंगटन में दिखी. अमेरिका लगातार संघर्षविराम की पैरवी करता रहा और भारत-पाक के बीच तनाव को कूटनीतिक रूप से थामने का प्रयास करता रहा. अब इस नई जानकारी से यह स्पष्ट हो जाता है कि वॉशिंगटन की बेचैनी भारत के किसी सैन्य एक्शन से नहीं, बल्कि उसके परमाणु हितों को लेकर थी.
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