इस्लामाबाद/काबुल/नई दिल्ली: दशकों तक पाकिस्तान की अफगान नीति का केंद्रबिंदु "रणनीतिक गहराई" की अवधारणा रही है. इस रणनीति के तहत अफगानिस्तान को पाकिस्तान की सुरक्षा नीति और भू-राजनीतिक प्रभाव के विस्तार का एक अहम हिस्सा माना जाता रहा. मगर, तालिबान के अफगानिस्तान पर 2021 में नियंत्रण के बाद से लेकर अब तक के घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान की यह रणनीति अब उसके लिए रणनीतिक विफलता में तब्दील हो चुकी है.
तालिबान को शुरू में एक सहयोगी या 'मित्र सरकार' मानने वाले पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं को अब यह एहसास हो रहा है कि वे अफगान तालिबान की राजनीतिक स्वतंत्रता और बदलती प्राथमिकताओं को समझने में चूक गए. आज पाकिस्तान और तालिबान के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हैं, सीमा विवाद गहराए हुए हैं और कूटनीतिक संवाद की जगह सार्वजनिक बयानबाज़ी और सैन्य कार्रवाइयों ने ले ली है.
1. पाकिस्तान की पुरानी रणनीति
पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान को एक "पाँचवां प्रांत" या "सुरक्षा गद्दी" के तौर पर देखता आया है. इसके पीछे दो प्रमुख कारण रहे:
भारत विरोधी नीति: पाकिस्तान चाहता था कि अफगानिस्तान में ऐसी सरकार हो जो भारत के प्रभाव को खत्म करे और पाकिस्तान की सुरक्षा नीति का समर्थन करे.
रणनीतिक गहराई (Strategic Depth): इस अवधारणा के तहत पाकिस्तान अफगान भूभाग को संभावित सैन्य संघर्ष की स्थिति में अपने सैनिकों और संसाधनों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करने की सोच रखता था.
इसके लिए पाकिस्तान ने 1980 के दशक में सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान, और बाद में तालिबान के उभार में, आर्थिक, सैन्य और खुफिया समर्थन देकर अपनी गहरी भूमिका बनाई.
2. 2021 में तालिबान की वापसी
जब 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया, तो पाकिस्तान में इसे एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा गया. कई पाकिस्तानी नेताओं और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने खुलेआम तालिबान की तारीफ की. तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने इसे "अफगानों द्वारा गुलामी की जंजीरों को तोड़ने वाला कदम" बताया.
कुछ विश्लेषकों ने यहां तक कह दिया कि अब अफगानिस्तान को कश्मीर नीति में एक नया 'फ्रंट' बनाया जा सकता है. लेकिन यह सोच जल्द ही हकीकत की दीवार से टकरा गई.
3. तालिबान का बदलता रवैया
2022-23 के बीच यह साफ़ होने लगा कि तालिबान, पाकिस्तान की अपेक्षा के विपरीत, स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना चाहता है. इसके कई संकेत सामने आए:
डूरंड लाइन पर तनाव: तालिबान ने पाकिस्तान द्वारा बनाई गई सीमा बाड़ (Fence) को कई स्थानों पर हटाया और डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा मानने से इनकार कर दिया.
TTP पर नरमी: पाकिस्तान की लगातार मांग के बावजूद तालिबान ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) पर निर्णायक कार्रवाई नहीं की, जिससे पाकिस्तान में आतंकी हमलों में भारी वृद्धि हुई.
आर्थिक मोर्चे पर अलगाव: तालिबान ने पाकिस्तान की आर्थिक निर्भरता से खुद को अलग करने की दिशा में कदम उठाए और वैकल्पिक व्यापार मार्गों की तलाश शुरू की.
4. तालिबान: पाकिस्तान दबाव डालने वाला पड़ोसी
तालिबान नेतृत्व ने कई मौकों पर पाकिस्तान के रवैये को "दबावपूर्ण" और "हितकारी नहीं" बताया. तालिबान के प्रवक्ताओं और मंत्रियों ने पाकिस्तान की नीतियों पर सवाल उठाए हैं, खासकर जब इस्लामाबाद ने तालिबान को भारत के साथ संबंध न बनाने की 'चेतावनी' दी.
तालिबान का यह रवैया पाकिस्तान के लिए एक रणनीतिक झटका था. वह एक ऐसी सरकार की अपेक्षा कर रहा था जो उसके हितों के अनुकूल चले, लेकिन तालिबान ने स्पष्ट किया कि वह पाकिस्तान का मोहरा नहीं बनेगा.
5. पाकिस्तान की प्रतिक्रिया: सैन्य और कूटनीतिक दबाव
तालिबान के 'स्वतंत्र' रुख के जवाब में पाकिस्तान ने कई कठोर कदम उठाए:
सीमा बंदी: तोर्खम सहित कई सीमा चौकियों को बंद कर दिया गया, जिससे अफगान कारोबारियों और आम नागरिकों को बड़ा नुकसान हुआ.
शरणार्थियों की वापसी: पाकिस्तान ने लाखों अफगान शरणार्थियों को वापस भेजना शुरू किया. आरोप लगे कि इस प्रक्रिया में मानवीय अधिकारों का उल्लंघन हुआ.
हवाई हमले: 2025 में पाकिस्तान ने अफगान क्षेत्र में हवाई हमले किए, जिनमें आम नागरिकों की भी मौत हुई. पाकिस्तान का दावा था कि ये हमले TTP के ठिकानों पर किए गए थे, मगर इससे दोनों देशों के रिश्ते और बिगड़ गए.
6. भारत की रणनीति: धैर्य और मानवीय दृष्टिकोण
भारत ने तालिबान की वापसी के बाद तत्काल कूटनीतिक संवाद बंद जरूर किया, लेकिन अफगान जनता से अपने रिश्ते नहीं तोड़े. भारत ने:
इस सतत सहयोग और गैर-हस्तक्षेप की नीति ने अफगान जनता और तालिबान नेतृत्व दोनों में भारत के प्रति सकारात्मक धारणा को बनाए रखा.
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