2025 के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा के बाद जितनी चर्चा पुरस्कार जीतने वालों को लेकर हुई, उससे कहीं अधिक बहस उन चेहरों को लेकर हो रही है जिन्हें यह सम्मान नहीं मिला और इस सूची में सबसे चर्चित नाम है अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. ट्रंप का दावा है कि उन्होंने दुनिया की सात बड़ी जंगों को रोका, और इस कारण वे नोबेल शांति पुरस्कार के प्रबल दावेदार थे. पाकिस्तान, इजरायल और कंबोडिया जैसे देशों के नेताओं ने उनके समर्थन में अनुशंसा भी की थी. बावजूद इसके, नोबेल चयन समिति ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया. इसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नोबेल पुरस्कारों का स्तर और विश्वसनीयता घट रही है?
ट्रंप की नाराजगी और सात संघर्षों का दावा
डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार यह दावा किया है कि उन्होंने वैश्विक स्तर पर कई बड़े संघर्षों को टालने में मदद की. इनमें उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच टकराव, मध्य पूर्व में अब्राहम समझौते, भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव और कुछ अन्य संघर्ष शामिल हैं. ट्रंप के अनुसार, उन्होंने "अमेरिकन स्टाइल" डिप्लोमेसी के जरिये कई देशों को युद्ध से बचाया और इसके लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए था.
हाल ही में ट्रंप ने कहा कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को टालने के लिए 200% तक टैरिफ लगाने की धमकी दी थी, जिससे दोनों देश पीछे हटे. हालांकि भारत सरकार ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी तरह के युद्ध विराम या तनाव कम करने के फैसले भारत और पाकिस्तान के बीच आपसी बातचीत से हुए, न कि किसी तीसरे देश की मध्यस्थता से.
शांति का नोबेल मचाडो को मिला
2025 का नोबेल शांति पुरस्कार गया वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को. उन्हें यह सम्मान अपने देश में लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए संघर्ष करने के लिए मिला. वेनेजुएला जैसे अस्थिर राजनीतिक माहौल में उनका डटे रहना और चुनावी अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाना निश्चित रूप से साहसी कदम रहा है.
हालांकि, यहां भी विवाद की गुंजाइश बनी रही क्योंकि वेनेजुएला के नेताओं को लंबे समय से अमेरिका के विरोध का सामना करना पड़ा है. मचाडो के समर्थन में क्यूबा और ब्राजील जैसे अमेरिका विरोधी देशों ने भी कुछ हद तक सहमति जताई, जिससे उनके संघर्ष की वैधता को और बल मिला.
क्या नोबेल का स्तर गिरा है?
इस बार के नोबेल पुरस्कारों को लेकर कई विश्लेषकों ने यह महसूस किया कि चयन में वह "चमक" नहीं दिखी, जिसकी उम्मीद की जाती है. खासकर शांति, साहित्य और अर्थशास्त्र के पुरस्कारों को लेकर यह सवाल और गहराया है.
1. शांति पुरस्कार में ध्रुवीकरण
नोबेल शांति पुरस्कार के चयन में इस बार भारी ध्रुवीकरण देखने को मिला. चर्चा किसी के जीतने से ज्यादा, ट्रंप जैसे नेताओं को न दिए जाने को लेकर रही. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक दबाव और वैश्विक समीकरणों का असर अब इस पुरस्कार पर भी दिखने लगा है.
2. साहित्य में फैंटेसी को तरजीह
2025 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार की बात करें तो यह हंगरी के लेखक लेस्लो क्रॉस्नोहोर्काई को मिला, जिनकी शैली कल्पनाशील और प्रयोगधर्मी है. हालांकि वे किसी भी तरह के हल्के-फुल्के लेखक नहीं हैं, लेकिन उनके साहित्य में ठोस सामाजिक या राजनीतिक संदर्भ की बजाय फैंटेसी और अमूर्त यथार्थ अधिक दिखाई देता है.
पहले जहां हान कांग, योन फुस्से और अब्दुलरजाक गुर्ना जैसे लेखकों के ज़रिए नोबेल ने गहरे यथार्थवाद और सामाजिक चिंताओं को सम्मान दिया था, वहीं इस बार की साहित्यिक पसंद ने कल्पनाशीलता को प्राथमिकता दी है.
3. अर्थशास्त्र: सृजन पर फोकस
पिछले कुछ वर्षों से यह उम्मीद की जा रही थी कि टॉमस पिकेटी और गैब्रिएल जुकमान जैसे आर्थिक विषमता पर काम करने वाले अर्थशास्त्रियों को सम्मान मिलेगा. लेकिन इस बार चयन समिति ने उन विशेषज्ञों को चुना, जिनका काम संपदा के वितरण की बजाय उसके सृजन पर केंद्रित है.
यह भी संकेत देता है कि नोबेल कमेटी मुख्यधारा की आर्थिक सोच को बनाए रखने की कोशिश कर रही है, बजाय इसके कि वह समाज में हो रही गहराती असमानताओं पर ध्यान केंद्रित करे.
ये भी पढ़ें- गाजा के बाद भारत-पाकिस्तान झगड़ा सुलझाने लगे ट्रंप, शहबाज के सामने किया पीएम मोदी का जिक्र, देखें VIDEO