पीले वस्त्रों में सुसज्जित, माथे पर चंदन का तिलक और चेहरे पर दिव्य शांति — यह छवि है वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज की. उनकी मधुर वाणी और आध्यात्मिक प्रवचनों ने लाखों लोगों के जीवन में भक्ति का प्रकाश फैलाया है. महाराज जी न केवल अपने ज्ञान के लिए जाने जाते हैं, बल्कि उनके व्यक्तित्व का हर पहलू लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है.
हाल ही में एक भक्त ने उनसे एक सवाल पूछा “महाराज जी, आप हमेशा अपने पूरे माथे पर चंदन का तिलक लगाते हैं, क्या यह दिखावा नहीं है?”
इस प्रश्न पर महाराज जी ने जो उत्तर दिया, उसने सभी भक्तों का हृदय छू लिया.
आराधना और भक्ति का प्रतीक है
प्रेमानंद महाराज ने मुस्कुराते हुए कहा, कि माथे पर तिलक लगाना कोई दिखावा नहीं है. यह हमारी आराधना और भक्ति का प्रतीक है. यह भगवान के प्रति हमारे प्रेम और समर्पण की अभिव्यक्ति है. उन्होंने समझाया कि तिलक लगाना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि साधक की आध्यात्मिक पहचान है. यह उस व्यक्ति की आंतरिक भावना को दर्शाता है, जो अपने ईष्टदेव की शरण में पूर्णतः समर्पित है.
“तिलक सजावट नहीं, राधा रानी को अर्पित प्रसाद है”
महाराज जी ने अपने उत्तर को आगे बढ़ाते हुए कहा,हमारे माथे पर जो चंदन तिलक है, वह कोई फैशन या सजावट नहीं, बल्कि राधा रानी को अर्पित किया गया प्रसाद है. यह आचार्य परंपरा की आज्ञा है कि माथे पर तिलक धारण किया जाए. यह हमें याद दिलाता है कि हम भक्त हैं, सेवक हैं, और हमारी हर सांस राधे-श्याम के नाम को समर्पित है.उन्होंने कहा कि तिलक शरीर का नहीं, आत्मा का श्रृंगार है. यह साधक को निरंतर उसकी भक्ति की याद दिलाता रहता है.
कंठी, माला और वस्त्र भक्ति के प्रतीक
प्रेमानंद महाराज ने आगे कहा कि जैसे माथे पर तिलक भक्ति की पहचान है, वैसे ही कंठी, माला और वस्त्र भी हमारी उपासना के अंग हैं.उन्होंने कहा,
“हमने जो कंठी धारण की है, वह हमारे गुरु ने दी है; माला भी गुरु प्रसाद है, और जो वस्त्र पहने हैं, वह भी हमारे गुरु के आशीर्वाद से प्राप्त हुए हैं. ये सभी वस्तुएं हमारे दिखावे के नहीं, बल्कि समर्पण के प्रतीक हैं.”महाराज जी के अनुसार, जब भक्त अपने ईष्ट की कृपा से प्राप्त वस्त्र और तिलक धारण करता है, तो वह बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक साधना को दर्शाता है.
भक्ति का बाह्य रूप भी उतना ही महत्वपूर्ण
महाराज जी ने यह भी कहा कि आज के समय में कई लोग यह सोचकर तिलक या कंठी नहीं धारण करते कि कहीं उन्हें “दिखावटी” न समझा जाए. लेकिन यह विचार स्वयं भक्ति के भाव को कमजोर करता है.उन्होंने कहा,अगर हम यह सोचकर तिलक या कंठी छोड़ दें कि लोग क्या सोचेंगे, तो हम अपनी उपासना अधूरी कर देंगे. यह तो अपने आराध्य के प्रसाद का अपमान होगा.उन्होंने यह भी जोड़ा कि तिलक, माला या भगवा वस्त्र धारण करने से किसी की भक्ति बड़ी या छोटी नहीं होती, लेकिन यह सब हमारे भीतर उस पवित्र भाव को जीवित रखता है कि हम भगवान से जुड़े हुए हैं.
तिलक आत्मा को प्रभु से जोड़ने की डोर
महाराज जी के अनुसार, माथे पर लगाया गया तिलक केवल एक चिह्न नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है. यह हमें निरंतर स्मरण कराता है कि हमारा जीवन किसी उद्देश्य के लिए है. सेवा, भक्ति और प्रेम के लिए.उन्होंने कहा,तिलक हमें भीतर से भगवान की याद दिलाता है. यह शरीर को नहीं, आत्मा को शीतलता देता है.
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