बिजली गिरने से पहले देगा चेतावनी... भारत के वैज्ञानिकों ने बनाया ऐसा सिस्टम जो बचाएगा लाखों जिंदगी

देश के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने एक उन्नत पूर्व चेतावनी प्रणाली (Lightning Early Warning System) विकसित की है, जो बिजली गिरने की संभावित घटनाओं का तीन घंटे पहले ही संकेत दे सकती है.

Will give warning before lightning strikes
प्रतीकात्मक तस्वीर/Photo- FreePik

नई दिल्ली: भारत ने प्राकृतिक आपदाओं से जन-जीवन की रक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है. देश के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने एक उन्नत पूर्व चेतावनी प्रणाली (Lightning Early Warning System) विकसित की है, जो बिजली गिरने की संभावित घटनाओं का तीन घंटे पहले ही संकेत दे सकती है. यह तकनीक देश के ग्रामीण और खुले क्षेत्रों में कार्यरत करोड़ों लोगों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकती है, जहां हर वर्ष हजारों लोग बिजली गिरने के कारण अपनी जान गंवाते हैं.

INSET-3D सैटेलाइट आधारित प्रणाली:

यह प्रणाली ISRO के INSAT-3D सैटेलाइट पर आधारित है, जो पृथ्वी की कक्षा से लगातार वायुमंडलीय और सतही परिवर्तनों की निगरानी करता है. वैज्ञानिकों ने बताया कि सैटेलाइट द्वारा मापे जाने वाले "आउटगोइंग लॉन्गवेव रेडिएशन" (OLR) में बदलाव बिजली गिरने से पहले स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है.

OLR पृथ्वी द्वारा अंतरिक्ष में छोड़ी जाने वाली गर्मी है. जब कोई बड़ा तूफानी सिस्टम या कंवेक्शन (गर्म हवा का ऊर्ध्वगामी प्रवाह) विकसित होता है, तो OLR में अचानक गिरावट आती है. यह गिरावट इस नई प्रणाली द्वारा लगभग 180 मिनट पहले पहचान ली जाती है, जिससे संभावित प्रभावित क्षेत्रों में चेतावनी भेजी जा सकती है.

चेतावनी समय 30 मिनट से बढ़कर 180 मिनट

पिछले वर्षों तक भारत में उपलब्ध बिजली चेतावनी प्रणालियाँ केवल 30 मिनट पहले तक का अलर्ट देने में सक्षम थीं. नई प्रणाली की सटीकता दर 75% से 85% तक दर्ज की गई है, जो इसे विश्व स्तर पर एक उन्नत और भरोसेमंद प्रणाली बनाती है.

एक लाख से ज्यादा जानें गईं, अब बदलाव की उम्मीद

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2002 से 2022 के बीच भारत में 52,477 मौतें बिजली गिरने से हुईं, जबकि दीर्घकालिक अध्ययनों के अनुसार 1967 से अब तक यह संख्या एक लाख को पार कर चुकी है. इनमें अधिकांश मामले खुले खेतों में काम कर रहे किसान, निर्माण श्रमिक, चरवाहे, और ग्रामीण महिलाएं व बच्चे हैं.

नई चेतावनी प्रणाली की मदद से इन संवेदनशील वर्गों को समय रहते सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सकता है, जिससे भविष्य में हजारों जानें बच सकती हैं.

कैसे काम करता है यह सिस्टम:

NRSC के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आलोक ताओरी के नेतृत्व में विकसित यह प्रणाली तीन प्रमुख सैटेलाइट संकेतकों के समन्वय पर आधारित है:

  • Land Surface Temperature (LST) – सतह की गर्मी और उसकी तीव्रता.
  • Cloud Motion Vector (CMV) – बादलों की गति और दिशा.
  • Outgoing Longwave Radiation (OLR) – अंतरिक्ष में निकलने वाली ऊष्मा ऊर्जा.

इन तीनों संकेतकों को जोड़कर एक Composite Lightning Risk Indicator तैयार किया गया है, जो संभावित बिजली गतिविधियों की पहचान कर सकता है और चेतावनी जारी करता है.

बिजली गिरने से पहले बदलता है "OLR पैटर्न"

डॉ. ताओरी बताते हैं, “जैसे उबलती केतली से पहले भाप का स्वरूप अचानक बदल जाता है, ठीक उसी तरह बिजली गिरने से पहले पृथ्वी की ऊष्मा का व्यवहार बदल जाता है.” जब वायुमंडल में तूफानी गतिविधियाँ शुरू होती हैं, तो गर्म हवा ऊंचाई पर जाकर ठंडी हो जाती है और ऊर्जा विकिरण (OLR) को अवरुद्ध करती है. यह परिवर्तन सैटेलाइट के जरिए स्पष्ट रूप से दर्ज किया जा सकता है.

किसानों और मछुआरों के लिए जीवनरक्षक प्रणाली

इस प्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे मौजूदा मोबाइल नेटवर्क, SMS अलर्ट और राज्य आपदा नियंत्रण केंद्रों के साथ जोड़ा जा सकता है. इसका विशेष लाभ उन राज्यों को होगा, जहां मानसून के समय बिजली गिरने की घटनाएं सबसे अधिक होती हैं, जैसे बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और ओडिशा.

सरकार इसे कृषि मौसम सेवा, पंचायती स्तर पर जागरूकता, और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के साथ समन्वय में जमीनी चेतावनी प्रणाली के रूप में लागू करने की दिशा में काम कर रही है.

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