जिसे ईरान के राष्ट्रपति चुनाव में मिली हार, उसने कैसे रोक दिया तेहरान पर अमेरिकी हमला?

Ali Larijani Iran: मध्य-पूर्व में एक बार फिर युद्ध के बादल मंडराते दिखे, लेकिन ऐन वक्त पर हालात ने करवट ले ली. अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई को फिलहाल टाल दिया है और बातचीत का रास्ता अपनाने पर सहमति जताई है. इस फैसले के पीछे सऊदी अरब, कतर और ओमान की कूटनीतिक पहल को अहम माना जा रहा है. 

World Ali Larijani lost in Iran presidential election he stop the American attack on Tehran
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Ali Larijani Iran: मध्य-पूर्व में एक बार फिर युद्ध के बादल मंडराते दिखे, लेकिन ऐन वक्त पर हालात ने करवट ले ली. अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई को फिलहाल टाल दिया है और बातचीत का रास्ता अपनाने पर सहमति जताई है. इस फैसले के पीछे सऊदी अरब, कतर और ओमान की कूटनीतिक पहल को अहम माना जा रहा है. 

तेहरान में इसे सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की सरकार के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है. इसी पूरे घटनाक्रम में एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, अली लारीजानी, जिन पर अमेरिका ने हाल ही में प्रतिबंध भी लगा दिया है.

अली लारीजानी: सत्ता के केंद्र में खड़ा एक मजबूत स्तंभ

अली लारीजानी इस समय ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव हैं. अगस्त 2025 में इस पद पर नियुक्ति के बाद से ही उन्हें ईरान की सुरक्षा और कूटनीति का मुख्य रणनीतिकार माना जाने लगा. राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से उनके वैचारिक मतभेद रहे हैं, इसके बावजूद सत्ता के शीर्ष पर उनकी पकड़ मजबूत बनी हुई है.

3 जून 1958 को जन्मे लारीजानी एक प्रभावशाली शिया मुस्लिम परिवार से आते हैं और डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर चुके हैं. साल 2004 में वे पहली बार सीधे तौर पर सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई की टीम में शामिल हुए, जब उन्हें उनका सलाहकार बनाया गया.

IRGC से लेकर मीडिया और राजनीति तक

लारीजानी का करियर बहुआयामी रहा है. उन्होंने अपनी शुरुआत इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) में एक कमांडर के तौर पर की. 1994 में उन्हें ईरान के सरकारी प्रसारक इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ब्रॉडकास्टिंग का प्रमुख नियुक्त किया गया, जहां से उन्होंने राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाई.

2005 में उन्होंने राष्ट्रपति पद का चुनाव भी लड़ा, हालांकि सफलता नहीं मिली. इसके बावजूद कट्टरपंथी खेमे में उनकी गिनती एक बड़े नेता के रूप में होती रही. 2024 के चुनाव में उन्हें अयोग्य घोषित किया गया, लेकिन खामेनेई के करीबी होने के कारण उनका राजनीतिक प्रभाव कम नहीं हुआ.

सऊदी से संवाद, पड़ोसियों से संपर्क

सुरक्षा परिषद की कमान संभालते ही लारीजानी ने ईरान की कूटनीति को नए सिरे से सक्रिय किया. उन्होंने सबसे पहले लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी रहे सऊदी अरब से संवाद बढ़ाया. बीते छह महीनों में वे कम से कम तीन बार सऊदी नेतृत्व से मिले, जिनमें सितंबर 2025 में क्राउन प्रिंस से हुई मुलाकात खास मानी जाती है.

इसके अलावा उन्होंने इराक, लेबनान और पाकिस्तान सहित ईरान के कई पड़ोसी देशों का दौरा किया. इन संपर्कों का असर हालिया संकट के दौरान साफ दिखा, जब अरब देशों ने अमेरिका को सैन्य कार्रवाई से पीछे हटने की सलाह दी. वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार, सऊदी नेतृत्व में कतर और ओमान ने अमेरिका को समझाया कि ईरान पर हमला पूरे क्षेत्र के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है.

अंदरूनी संकट में भी सक्रिय भूमिका

जब ईरान में विरोध प्रदर्शनों ने उग्र रूप लेना शुरू किया, तब भी लारीजानी खुद सामने आए. उन्होंने सेना में तीन बड़े प्रशासनिक बदलाव किए, जिनमें अहमद वाहिदी को उप-कमांडर और ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद अकरमिनिया को सेना का प्रवक्ता नियुक्त किया गया.

सरकार की ओर से लारीजानी खुद टीवी इंटरव्यू में दिखाई दिए और उन्होंने विरोध को अमेरिका व इजराइल से प्रेरित बताया. ईरानी मीडिया में इस नैरेटिव को व्यापक तौर पर प्रचारित किया गया.

अमेरिका का प्रतिबंध और बदली रणनीति

अमेरिका ने लारीजानी पर प्रतिबंध ऐसे वक्त लगाया, जब पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर प्रस्तावित स्ट्राइक को होल्ड करने का आदेश दिया. एनबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, व्हाइट हाउस की सुरक्षा बैठक में कोई भी अधिकारी यह भरोसा नहीं दिला सका कि हमले के बाद ईरान में सत्ता परिवर्तन हो जाएगा.

अमेरिकी सेना ने साफ किया कि अगर हमला निर्णायक नहीं हुआ, तो अमेरिका को लंबी जंग में उतरना पड़ सकता है और फिलहाल अमेरिकी सैनिक इसके लिए तैयार नहीं हैं.

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